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Kharge Students : “संवाद की जगह सख्ती क्यों?” — राज्यसभा में छात्रों के मुद्दे पर सरकार से खड़गे के तीखे सवाल

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नई दिल्ली, 30 जुलाई । Kharge Students :  राज्यसभा में लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने छात्रों के आंदोलन और उससे जुड़े घटनाक्रम को लेकर केंद्र सरकार पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने छात्रों की समस्याओं को समझने और उनसे संवाद स्थापित करने के बजाय बल प्रयोग का रास्ता अपनाया। साथ ही उन्होंने कहा कि पूरे घटनाक्रम पर सरकार की ओर से अपेक्षित जवाबदेही भी नहीं दिखाई गई।

खड़गे ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार की पहली जिम्मेदारी नागरिकों, विशेषकर युवाओं और छात्रों की बात सुनना है। यदि छात्र अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर रहे थे, तो उनके साथ बातचीत कर समाधान निकालने का प्रयास होना चाहिए था। लेकिन सरकार ने इस अवसर को गंवा दिया और हालात को संभालने के बजाय कठोर कदम उठाए।

“युवाओं की आवाज को दबाया नहीं जा सकता”

अपने संबोधन में खड़गे ने कहा कि देश के छात्र और युवा लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत हैं। उनका कहना था कि युवाओं की आवाज को दबाया नहीं जा सकता और अंततः सरकार को उनके सवालों का जवाब देना ही होगा। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि सरकार की ओर से हर महत्वपूर्ण विषय पर कुछ चुनिंदा मंत्री ही सामने आते हैं, जबकि जिस मंत्रालय से संबंधित मामला होता है, उसके मंत्री अक्सर जवाब देने से बचते नजर आते हैं।

उन्होंने कहा कि 20 जुलाई को हुई घटनाओं के बाद सरकार को तुरंत संसद और देश के सामने पूरे घटनाक्रम की विस्तृत जानकारी रखनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं किया गया और पूरे मामले पर स्पष्ट एवं व्यापक बयान देने से परहेज किया गया। खड़गे के अनुसार, सरकार ने छात्रों से सीधे संवाद स्थापित करने के बजाय अन्य माध्यमों से अपनी बात रखने की कोशिश की, जिससे स्थिति और अधिक जटिल हो गई।

पुलिस कार्रवाई पर उठाए कई सवाल

नेता प्रतिपक्ष ने छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल भी उठाए। उन्होंने पूछा कि प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज करने का आदेश किस स्तर पर दिया गया। इसी तरह उन्होंने यह भी जानना चाहा कि आंसू गैस के गोले छोड़ने का निर्णय किसने लिया और पैलेट गन के इस्तेमाल की अनुमति किस अधिकारी या एजेंसी ने दी।

खड़गे ने यह भी सवाल उठाया कि प्रदर्शन के दौरान सादे कपड़ों में मौजूद वे लोग कौन थे, जिन पर छात्रों के साथ मारपीट करने के आरोप लगाए गए। उन्होंने पूछा कि दिल्ली पुलिस, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) और रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) ने आखिर किसके निर्देश पर कार्रवाई की।

उन्होंने कहा कि यदि गृह मंत्री इन सवालों का जवाब देने में असमर्थ हैं, तो उन्हें इसकी नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। उनके अनुसार, लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही सर्वोपरि होती है और सरकार को प्रत्येक कार्रवाई का स्पष्ट स्पष्टीकरण देना चाहिए।

“मामला केवल दिल्ली तक सीमित नहीं”

खड़गे ने अपने भाषण में कहा कि छात्रों के साथ कथित कठोर कार्रवाई का मामला केवल राजधानी दिल्ली तक सीमित नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि बिहार, उत्तर प्रदेश और असम सहित कई राज्यों में भी छात्रों के आंदोलनों के दौरान सख्त कार्रवाई की गई, लेकिन केंद्र सरकार ने इस पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी।

उन्होंने कहा कि सरकार को देश के सामने यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या उसे छात्रों के खिलाफ हुई कथित कार्रवाई पर कोई पछतावा है या नहीं। उनका कहना था कि यदि कहीं भी प्रशासनिक स्तर पर अत्यधिक बल प्रयोग हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।

पूर्व शिक्षा मंत्री के स्वागत पर भी उठे सवाल

अपने संबोधन के दौरान खड़गे ने पूर्व शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद संसद परिसर में सत्ता पक्ष द्वारा किए गए स्वागत का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जिस तरह उनका स्वागत किया गया, उससे यह संदेश गया मानो किसी बड़ी उपलब्धि का उत्सव मनाया जा रहा हो।

खड़गे का कहना था कि यदि किसी मंत्री के कार्यकाल में परीक्षा व्यवस्था से जुड़ी गंभीर घटनाएं सामने आई हों, तो ऐसे समय में आत्ममंथन और खेद व्यक्त करना अधिक उचित होता। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक रूप से स्वागत करने से गलत संदेश जाता है और इससे उन छात्रों की भावनाओं को भी ठेस पहुंच सकती है, जो परीक्षा संबंधी समस्याओं से प्रभावित हुए हैं।

केवल सजा बढ़ाने से नहीं रुकेगा पेपर लीक

लोक परीक्षा संशोधन विधेयक पर अपनी बात रखते हुए खड़गे ने कहा कि केवल दोषियों के लिए सजा और जुर्माने की राशि बढ़ा देने से पेपर लीक जैसी घटनाओं पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जा सकती।

उन्होंने कहा कि परीक्षा प्रणाली में संस्थागत और प्रशासनिक सुधार सबसे अधिक जरूरी हैं। यदि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) और परीक्षा संचालन की पूरी व्यवस्था को पारदर्शी, सुरक्षित और जवाबदेह नहीं बनाया गया, तो भविष्य में भी पेपर लीक जैसी घटनाएं सामने आती रहेंगी और संसद को बार-बार इसी मुद्दे पर चर्चा करनी पड़ेगी।

उन्होंने सरकार से मांग की कि वह ऐसी व्यवस्था विकसित करे, जिससे प्रश्नपत्र लीक होने की संभावना ही समाप्त हो जाए। उनका कहना था कि केवल दोषियों को दंडित करने के बजाय व्यवस्था को मजबूत बनाना अधिक प्रभावी समाधान होगा।

प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग के आरोप

खड़गे ने दावा किया कि 20 जुलाई को हजारों छात्र शांतिपूर्ण मार्च और प्रदर्शन कर रहे थे। उनके अनुसार, इन छात्रों का उद्देश्य सरकार तक अपनी बात पहुंचाना और संवाद के माध्यम से समाधान निकालना था।

उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान छात्रों को लाठीचार्ज, आंसू गैस, पानी की बौछार और पैलेट गन जैसी पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ा। साथ ही कई स्थानों पर बैरिकेड लगाए गए, मेट्रो और रेलवे स्टेशनों को बंद किया गया तथा इंटरनेट सेवाएं भी बाधित की गईं।

खड़गे का कहना था कि इन कदमों का असर केवल प्रदर्शनकारी छात्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम नागरिकों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन नागरिकों का अधिकार है और प्रशासन को इसे ध्यान में रखते हुए संतुलित रवैया अपनाना चाहिए।

घायलों की जिम्मेदारी कौन लेगा?

नेता प्रतिपक्ष ने दावा किया कि आंदोलन के दौरान 100 से अधिक छात्र घायल हुए। उन्होंने कहा कि कई छात्रों को गंभीर चोटें आईं और उन्हें अस्पतालों में भर्ती कराना पड़ा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ छात्रों की आंखों में पैलेट लगने से उन्हें गंभीर नुकसान पहुंचा।

उन्होंने विशेष रूप से उन छात्रों का उल्लेख किया, जो दूर-दराज के राज्यों और ग्रामीण क्षेत्रों से अपनी पढ़ाई और भविष्य की उम्मीद लेकर राजधानी पहुंचे थे। खड़गे ने कहा कि उनके साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया, उसे देखकर उन्हें दुख और शर्म महसूस हुई।

उन्होंने सवाल उठाया कि जिन छात्रों के हाथ-पैर टूटे, जो अस्पतालों में भर्ती हुए और जिन्हें गंभीर चोटें आईं, उनकी जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा। उनके अनुसार, यदि समय रहते छात्रों से बातचीत की जाती और उनकी चिंताओं को गंभीरता से सुना जाता, तो हालात इतने नहीं बिगड़ते।

जवाबदेही और सुधार की मांग

अपने संबोधन के अंत में खड़गे ने कहा कि सरकार को केवल घटनाओं के बाद कार्रवाई करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी परिस्थितियां दोबारा उत्पन्न ही न हों। उन्होंने सरकार से परीक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार, छात्रों के साथ नियमित संवाद और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती संवाद, पारदर्शिता और विश्वास पर टिकी होती है। यदि छात्रों की आवाज सुनी जाएगी और उनकी समस्याओं का समय रहते समाधान किया जाएगा, तो न केवल विवाद कम होंगे बल्कि देश की परीक्षा व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर लोगों का भरोसा भी मजबूत होगा।

jahanvi singh
Author: jahanvi singh

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