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Hormuz Crisis : होर्मुज संकट पर सरकार अलर्ट: पीएम मोदी ने बुलाई हाई-लेवल बैठक, ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति व्यवस्था पर मंथन

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नई दिल्ली, 30 जुलाई । Hormuz Crisis :  पश्चिम एशिया में लगातार बिगड़ते हालात और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े संकट के बीच भारत सरकार पूरी तरह सतर्क नजर आ रही है। इसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद स्थित अपने कार्यालय में गुरुवार को एक महत्वपूर्ण हाई-लेवल बैठक की अध्यक्षता की। बैठक में देश की ऊर्जा सुरक्षा, ईंधन आपूर्ति, समुद्री व्यापार और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों के भारत पर पड़ने वाले प्रभावों की व्यापक समीक्षा की गई।

बैठक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि अंतरराष्ट्रीय संकट का असर देश की ऊर्जा जरूरतों, औद्योगिक उत्पादन और आम नागरिकों पर न्यूनतम रहे। सरकार ने संबंधित मंत्रालयों और एजेंसियों को सभी आवश्यक तैयारियां बनाए रखने के निर्देश दिए हैं।

बैठक में शामिल हुए सरकार के प्रमुख मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई इस अहम बैठक में गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल मौजूद रहे।

इसके अलावा पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी, स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल तथा बंदरगाह, जहाजरानी एवं जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने भी बैठक में हिस्सा लिया। विभिन्न मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी मौजूदा हालात और संभावित चुनौतियों पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

होर्मुज जलडमरूमध्य में संकट ने बढ़ाई दुनिया की चिंता

सूत्रों के अनुसार बैठक का मुख्य फोकस पश्चिम एशिया में जारी तनाव और विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति थी। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक स्तर पर बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति इसी रास्ते से होती है।

हाल के दिनों में इस क्षेत्र में उत्पन्न बाधाओं और सुरक्षा संबंधी जोखिमों के कारण तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में दिखाई दे रहा है, जहां कच्चे तेल और अन्य ईंधन उत्पादों की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है।

व्यावसायिक जहाजों पर हमलों से बढ़ी सुरक्षा चुनौती

Hormuz Crisis : पश्चिम एशिया के समुद्री क्षेत्र में कई व्यावसायिक जहाजों पर हुए हमलों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। इन घटनाओं ने वैश्विक समुद्री व्यापार की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

भारतीय नाविकों की मौत की घटनाओं ने भी सरकार की चिंता बढ़ाई है। केंद्र सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए ईरान और अमेरिका सहित संबंधित देशों के साथ राजनयिक स्तर पर बातचीत की है। विदेश मंत्रालय लगातार भारतीय नागरिकों और समुद्री कर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रयासों में जुटा हुआ है।

ऊर्जा आपूर्ति बाधित न हो, सरकार की पहली प्राथमिकता

बैठक में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि देश में पेट्रोलियम उत्पादों, प्राकृतिक गैस और अन्य आवश्यक ऊर्जा संसाधनों की आपूर्ति किसी भी परिस्थिति में प्रभावित नहीं होनी चाहिए।

सरकार पहले से ही वैकल्पिक आयात स्रोतों की पहचान, रणनीतिक भंडार के उपयोग और आपूर्ति शृंखला को मजबूत बनाने जैसे कदम उठा रही है। अधिकारियों ने भरोसा दिलाया कि देश में ईंधन की उपलब्धता बनाए रखने के लिए पर्याप्त व्यवस्थाएं मौजूद हैं और किसी प्रकार की घबराहट की आवश्यकता नहीं है।

संसद में सरकार ने बताए राहत और सुरक्षा के कदम

सरकार ने इस सप्ताह संसद में जानकारी दी कि पश्चिम एशिया संकट के बावजूद ऊर्जा सहित महत्वपूर्ण औद्योगिक कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए कई ठोस कदम उठाए गए हैं।

इन उपायों का उद्देश्य उद्योगों पर बढ़ती लागत का दबाव कम करना, व्यापारिक गतिविधियों को सुचारु बनाए रखना, उत्पादन क्षमता को बनाए रखना और देश की व्यापक आर्थिक स्थिरता की रक्षा करना है। सरकार लगातार वैश्विक परिस्थितियों की निगरानी कर रही है ताकि जरूरत पड़ने पर तत्काल अतिरिक्त कदम उठाए जा सकें।

उर्वरक और कृषि क्षेत्र के लिए भी विशेष रणनीति

Hormuz Crisis : ऊर्जा संकट का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कृषि क्षेत्र भी इससे प्रभावित हो सकता है। इसे ध्यान में रखते हुए सरकार ने उर्वरकों और अन्य आवश्यक कृषि इनपुट की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विशेष रणनीति तैयार की है।

गैस की नियमित आपूर्ति, विभिन्न देशों से आयात के विकल्प बढ़ाना, समय से पहले खरीदारी करना और पर्याप्त बफर स्टॉक बनाए रखना सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है। इससे किसानों को आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है।

भू-राजनीतिक तनाव का उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर असर

विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का सबसे अधिक असर उन देशों पर पड़ता है जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए आयातित कच्चे तेल पर निर्भर हैं। भारत भी दुनिया के प्रमुख कच्चा तेल आयातक देशों में शामिल है।

ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर भारत के आयात बिल, परिवहन लागत, महंगाई और औद्योगिक उत्पादन पर पड़ सकता है। यही कारण है कि सरकार लगातार वैश्विक घटनाक्रमों पर नजर बनाए हुए है और समय-समय पर अपनी रणनीति में बदलाव कर रही है।

कच्चे तेल की कीमतों में आई राहत

हालांकि अंतरराष्ट्रीय तनाव के बावजूद भारत के लिए एक राहत की खबर यह रही कि भारतीय कच्चे तेल की औसत बास्केट कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार अप्रैल 2026 में भारतीय कच्चे तेल की औसत कीमत 114.5 डॉलर प्रति बैरल थी, जो जुलाई 2026 में (22 जुलाई तक) घटकर लगभग 77.6 डॉलर प्रति बैरल रह गई। इससे देश के आयात बिल पर दबाव कम होने और अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

व्यापार और निर्यात को सहारा देने के लिए विशेष योजनाएं

Hormuz Crisis : सरकार ने केवल ऊर्जा क्षेत्र ही नहीं बल्कि व्यापार और निर्यात गतिविधियों को भी सुरक्षित रखने के लिए कई कदम उठाए हैं।

चुनिंदा पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक पर अस्थायी रूप से सीमा शुल्क में छूट दी गई, ताकि उद्योगों को कच्चा माल उचित लागत पर उपलब्ध हो सके। इसके साथ ही ‘भारत मैरीटाइम इंश्योरेंस पूल रिलीफ’ योजना शुरू की गई, जिससे समुद्री व्यापार और निर्यात गतिविधियों को बढ़ावा देने में मदद मिले।

सरकार ने युद्ध-जोखिम बीमा, बढ़े हुए माल ढुलाई खर्च और लॉजिस्टिक लागत के प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से निर्यातकों को अतिरिक्त राहत भी प्रदान की है।

निर्यातकों और उद्योगों को मिली अतिरिक्त राहत

निर्यात क्षेत्र को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए आरओडीटीईपी (RoDTEP) योजना के तहत मिलने वाले लाभों को दोबारा बहाल किया गया है। इससे निर्यातकों को शुल्क और करों में राहत मिल सकेगी तथा वैश्विक बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत होगी।

इसके अलावा उद्योगों और कारोबारों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने के लिए ‘इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम (ECLGS) 5.0’ के तहत अतिरिक्त लिक्विडिटी सपोर्ट भी दिया जा रहा है, जिससे कठिन वैश्विक परिस्थितियों में भी औद्योगिक गतिविधियां प्रभावित न हों।

सरकार की रणनीति: सतर्क निगरानी और त्वरित कार्रवाई

पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता को देखते हुए केंद्र सरकार फिलहाल पूरी तरह सतर्क है। ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार, औद्योगिक उत्पादन, कृषि आवश्यकताओं और आर्थिक स्थिरता को एक साथ ध्यान में रखते हुए बहुस्तरीय रणनीति पर काम किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई इस उच्चस्तरीय बैठक से यह स्पष्ट संकेत मिला है कि सरकार अंतरराष्ट्रीय संकट के संभावित प्रभावों से निपटने के लिए पहले से तैयारी कर रही है। आने वाले दिनों में वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक निर्णय लिए जाएंगे ताकि देश की ऊर्जा आपूर्ति, आर्थिक गतिविधियां और आम नागरिकों के हित सुरक्षित रह सकें।

jahanvi singh
Author: jahanvi singh

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