नई दिल्ली, 9 अक्टूबर 2026। Cancer Drug Prices
देश में कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों और उनके परिवारों को इलाज के खर्च से राहत दिलाने के लिए केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सरकार ने गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं की आपूर्ति और बिक्री पर व्यापारिक मार्जिन को सीमित करने की व्यवस्था को मंजूरी दे दी है। इस फैसले का उद्देश्य कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली महंगी दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण रखना, दवा वितरण व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाना और मरीजों को उचित कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराना है।
सरकार के इस निर्णय के तहत संबंधित गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं पर अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के 30 प्रतिशत तक ही व्यापारिक मार्जिन की सीमा निर्धारित की जाएगी। सरकार की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस व्यवस्था से कई कैंसर रोधी दवाओं की कीमतों में 70 प्रतिशत तक की कमी आने की संभावना है। इसके परिणामस्वरूप कैंसर मरीजों और उनके परिवारों को हर साल लगभग 2,500 करोड़ रुपये तक की बचत हो सकती है। साथ ही, कैंसर के इलाज पर अपनी जेब से खर्च होने वाली राशि में भी उल्लेखनीय कमी आने की उम्मीद जताई गई है।
यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है, जब कैंसर के इलाज की बढ़ती लागत देश के लाखों परिवारों के लिए गंभीर आर्थिक चुनौती बनी हुई है। कैंसर के इलाज में लंबे समय तक दवाओं का सेवन, नियमित जांच, अस्पताल में भर्ती, कीमोथेरेपी और अन्य चिकित्सकीय प्रक्रियाओं की आवश्यकता पड़ सकती है। ऐसे में दवाओं की ऊंची कीमतें मरीजों और उनके परिजनों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव डालती हैं। सरकार की नई पहल का उद्देश्य दवा की कीमतों में अनावश्यक बढ़ोतरी को रोकना और मरीजों को उपचार के दौरान आर्थिक राहत उपलब्ध कराना है।
गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं की कीमतों पर भी होगा नियंत्रण
रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के औषधि विभाग की ओर से जारी बयान में बताया गया है कि देश में कैंसर के उपचार के लिए इस्तेमाल होने वाली कुछ आवश्यक दवाएं पहले से ही अनुसूचित दवाओं की सूची में शामिल हैं। इन दवाओं की अधिकतम कीमत सरकार द्वारा निर्धारित की जाती है। इस कारण इनके मूल्य निर्धारण पर पहले से ही नियामकीय नियंत्रण लागू है।
हालांकि, कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली बड़ी संख्या में ऐसी दवाएं भी उपलब्ध हैं, जो अनुसूचित सूची में शामिल नहीं हैं। इन गैर-अनुसूचित दवाओं पर पहले से उसी प्रकार का प्रत्यक्ष मूल्य नियंत्रण लागू नहीं था, जैसा अनुसूचित दवाओं पर होता है। नतीजतन, दवा निर्माता से लेकर वितरक, थोक विक्रेता और खुदरा मेडिकल स्टोर तक पहुंचने के दौरान इन दवाओं की कीमत में काफी वृद्धि हो सकती थी।
सरकार ने इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन की सीमा निर्धारित करने का फैसला किया है। नई व्यवस्था के माध्यम से इन दवाओं की कीमतों पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया जाएगा। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दवा की आपूर्ति श्रृंखला में अलग-अलग स्तरों पर अत्यधिक व्यापारिक मार्जिन जोड़कर मरीजों से अनावश्यक रूप से अधिक कीमत न वसूली जाए।
इस व्यवस्था के लागू होने के बाद संबंधित दवाओं की बिक्री और वितरण के दौरान व्यापारिक मार्जिन निर्धारित सीमा के भीतर रखना होगा। सरकार को उम्मीद है कि इससे दवा की शुरुआती कीमत और मरीज द्वारा चुकाई जाने वाली अंतिम कीमत के बीच का अंतर कम होगा। इससे विशेष रूप से उन मरीजों को राहत मिलने की संभावना है, जिन्हें कैंसर के उपचार के लिए महंगी दवाएं नियमित रूप से खरीदनी पड़ती हैं।
विशेषज्ञ समिति करेगी दवाओं की पहचान
Cancer Drug Prices : सरकार की नई व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए दवाओं की पहचान और नियामकीय प्रक्रिया को भी निर्धारित किया गया है। आधिकारिक बयान के अनुसार, स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस) के अंतर्गत गठित विशेषज्ञ समिति उन कैंसर रोधी दवाओं की सूची तैयार करेगी, जिन्हें इस नई व्यवस्था के दायरे में शामिल किया जाना है।
विशेषज्ञ समिति संबंधित दवाओं की पहचान करने के बाद अपनी सूची तैयार करेगी। इसके पश्चात राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) आवश्यक प्रक्रिया पूरी कर अंतिम अधिसूचना जारी करेगा। इसी अधिसूचना के माध्यम से संबंधित दवाओं पर लागू होने वाली व्यवस्था को औपचारिक रूप दिया जाएगा।
एनपीपीए देश में दवाओं की कीमतों से जुड़े नियमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस प्राधिकरण का कार्य दवाओं की निर्धारित कीमतों और संबंधित मूल्य नियंत्रण प्रावधानों के अनुपालन की निगरानी करना भी है। नई व्यवस्था में भी प्राधिकरण की भूमिका अहम होगी, क्योंकि अंतिम अधिसूचना जारी होने के बाद संबंधित दवाओं के व्यापारिक मार्जिन पर निर्धारित सीमा लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
सरकार की योजना है कि इस प्रक्रिया के माध्यम से ऐसी दवाओं को भी कीमतों से संबंधित सुरक्षा व्यवस्था के दायरे में लाया जाए, जिनकी कीमतों पर अब तक प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं था। इससे कैंसर के उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतों को लेकर अधिक व्यवस्थित और पारदर्शी व्यवस्था विकसित करने में मदद मिल सकती है।
कैंसर के बढ़ते मामलों के बीच इलाज का खर्च बड़ी चुनौती
Cancer Drug Prices : केंद्र सरकार ने अपने बयान में कैंसर के बढ़ते मामलों और उपचार की लागत को इस निर्णय का एक प्रमुख कारण बताया है। उपलब्ध अनुमान के अनुसार, भारत में प्रति एक लाख आबादी पर लगभग 60 लोग कैंसर से प्रभावित हैं। कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी के साथ ही इसके उपचार की उपलब्धता और आर्थिक वहनीयता का सवाल भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है।
कैंसर का इलाज कई मामलों में लंबी अवधि तक चलता है। बीमारी के प्रकार, उसकी अवस्था, मरीज की शारीरिक स्थिति और चिकित्सकीय सलाह के आधार पर उपचार की पद्धति अलग-अलग हो सकती है। कुछ मरीजों को लंबे समय तक दवाओं का सेवन करना पड़ता है, जबकि अन्य मरीजों को कीमोथेरेपी, लक्षित चिकित्सा या दूसरी उपचार पद्धतियों के साथ महंगी दवाओं की आवश्यकता होती है।
ऐसी स्थिति में दवाओं की कीमतों में थोड़ी-सी बढ़ोतरी भी परिवार के कुल चिकित्सा खर्च को काफी प्रभावित कर सकती है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह स्थिति और अधिक कठिन हो जाती है। कई बार उपचार का खर्च परिवार की बचत पर दबाव डालता है और दूसरे जरूरी खर्चों को भी प्रभावित करता है।
सरकार का मानना है कि कैंसर रोधी दवाओं के व्यापारिक मार्जिन को सीमित करने से मरीजों को दवाएं अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। इससे कैंसर के उपचार पर होने वाले खर्च को कम करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाया जा सकेगा।
हालांकि, वास्तविक बचत इस बात पर निर्भर करेगी कि कौन-कौन सी दवाएं अंतिम सूची में शामिल होती हैं, उनकी वर्तमान कीमतें क्या हैं और नई व्यवस्था लागू होने के बाद उनकी खुदरा कीमतों में कितना बदलाव आता है।
एनपीपीए के विश्लेषण में सामने आई कीमतों में भारी बढ़ोतरी
राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) के विश्लेषण में गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं की कीमतों को लेकर महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। विश्लेषण के अनुसार, इन दवाओं पर औसतन 170 प्रतिशत तक की मूल्य वृद्धि देखी गई है। कुछ मामलों में यह बढ़ोतरी 700 प्रतिशत से भी अधिक पाई गई।
इन आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि दवा निर्माता से लेकर अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचने की प्रक्रिया में कुछ कैंसर रोधी दवाओं की कीमत काफी बढ़ सकती है। आपूर्ति श्रृंखला में शामिल विभिन्न स्तरों पर जोड़े जाने वाले व्यापारिक मार्जिन के कारण मरीज को दवा खरीदने के लिए निर्माता की शुरुआती कीमत की तुलना में कहीं अधिक राशि चुकानी पड़ सकती है।
उदाहरण के तौर पर, जब किसी दवा की शुरुआती कीमत और उसके अधिकतम खुदरा मूल्य के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है, तो मरीज को वही दवा खरीदने के लिए अतिरिक्त राशि खर्च करनी पड़ती है। यदि मरीज को लंबे समय तक दवा लेनी हो, तो यह अंतर उसके कुल उपचार खर्च को काफी बढ़ा सकता है।
एनपीपीए के विश्लेषण में यह भी सामने आया कि एक ही दवा की कीमत अलग-अलग बिक्री माध्यमों पर अलग हो सकती है। खुदरा मेडिकल स्टोर, अस्पतालों की फार्मेसी और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर एक ही दवा के लिए अलग-अलग कीमतें देखने को मिलीं।
इस तरह की मूल्य असमानता मरीजों और उनके परिजनों के लिए परेशानी का कारण बन सकती है। गंभीर बीमारी से जूझ रहे परिवारों के लिए अलग-अलग स्थानों पर दवा की कीमतों की तुलना करना हमेशा आसान नहीं होता। कई बार उपचार की जरूरत के कारण उन्हें तुरंत दवा खरीदनी पड़ती है, जिससे सस्ती कीमत पर दवा तलाशने का अवसर सीमित हो जाता है।
सरकार की नई व्यवस्था का उद्देश्य आपूर्ति श्रृंखला में अत्यधिक मार्जिन को सीमित करके ऐसी परिस्थितियों को नियंत्रित करना है। इससे मरीजों को अधिक न्यायसंगत कीमतों पर दवाएं उपलब्ध कराने में मदद मिलने की उम्मीद है।
महाराष्ट्र, राजस्थान और कर्नाटक समेत कई राज्यों से उठी थी मांग
Cancer Drug Prices : कैंसर रोधी दवाओं की ऊंची कीमतों को लेकर लंबे समय से विभिन्न राज्यों में चिंता जताई जाती रही है। महाराष्ट्र, राजस्थान और कर्नाटक सहित कई राज्यों के अधिकारियों, मरीज समूहों और सामाजिक संगठनों ने इस मुद्दे पर ध्यान आकर्षित किया था।
इन समूहों की प्रमुख चिंता यह रही है कि दवाओं की खरीद कीमत और मरीजों से वसूले जाने वाले अधिकतम खुदरा मूल्य के बीच कई बार काफी बड़ा अंतर होता है। उनका मानना रहा है कि इस अंतर को कम करने के लिए ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है, जिससे दवाओं के वितरण और बिक्री के दौरान अनुचित रूप से अधिक मार्जिन जोड़ने की गुंजाइश सीमित हो सके।
कैंसर के मरीजों के लिए दवाओं की उपलब्धता जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण उनकी कीमत भी है। यदि किसी दवा की कीमत मरीज की आर्थिक क्षमता से बाहर हो जाती है, तो उसके लिए लंबे समय तक उपचार जारी रखना मुश्किल हो सकता है। इसलिए दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता और उनकी उचित उपलब्धता को कैंसर उपचार से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं के रूप में देखा जाता है।
सरकार का कहना है कि गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन की सीमा लागू करने से आपूर्ति श्रृंखला में कीमतों की अनावश्यक बढ़ोतरी पर अंकुश लगाने में मदद मिल सकती है। इससे दवा की बिक्री में शामिल विभिन्न पक्षों के मार्जिन को निर्धारित सीमा के भीतर रखने का प्रयास किया जाएगा।
इस फैसले के माध्यम से सरकार ने कैंसर के उपचार में इस्तेमाल होने वाली उन दवाओं पर भी ध्यान केंद्रित किया है, जो अब तक प्रत्यक्ष मूल्य नियंत्रण के दायरे से बाहर थीं।
वर्ष 2019 में भी सरकार ने उठाया था ऐसा कदम
Cancer Drug Prices : केंद्र सरकार ने इस फैसले के संदर्भ में वर्ष 2019 में लागू की गई व्यवस्था का भी उल्लेख किया है। मंत्रालय के बयान के अनुसार, फरवरी 2019 में सरकार के निर्देश पर एनपीपीए ने 42 गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन की सीमा निर्धारित की थी।
उस समय उठाए गए इस कदम का उद्देश्य भी कैंसर की दवाओं की कीमतों को कम करना और मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को घटाना था। सरकार के अनुसार, उस व्यवस्था के लागू होने के बाद कुछ दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमतों में 91 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई थी।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2019 में लागू की गई इस व्यवस्था से 526 ब्रांडों पर मरीजों को सालाना लगभग 984 करोड़ रुपये की बचत हुई थी। सरकार ने इस अनुभव को कैंसर रोधी दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण बताया है।
वर्ष 2019 की पहल के दौरान सीमित संख्या में गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं को व्यापारिक मार्जिन नियंत्रण के दायरे में लाया गया था। अब सरकार इसी मॉडल को व्यापक स्तर पर लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, ताकि अधिक दवाओं को मूल्य सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्था में शामिल किया जा सके।
सरकार की ओर से प्रस्तुत पिछले अनुभव के अनुसार, व्यापारिक मार्जिन को सीमित करने से कुछ दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य में बड़ी कमी लाने में मदद मिली थी। इसी आधार पर नई व्यवस्था से भी मरीजों को आर्थिक लाभ मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
हालांकि, पिछली व्यवस्था में हासिल की गई बचत और नई व्यवस्था से अनुमानित बचत अलग-अलग अवधि और दवाओं के दायरे से संबंधित हैं। इसलिए नई पहल के वास्तविक प्रभाव का आकलन इसके कार्यान्वयन और संबंधित दवाओं की अंतिम सूची के आधार पर किया जा सकेगा।
ब्रांडेड और जेनेरिक, दोनों तरह की दवाएं होंगी दायरे में
Cancer Drug Prices : सरकार ने स्पष्ट किया है कि नई व्यवस्था केवल किसी एक प्रकार की कैंसर रोधी दवा तक सीमित नहीं रहेगी। इसके तहत ब्रांडेड और जेनेरिक, दोनों तरह की दवाओं को शामिल किया जा सकेगा।
ब्रांडेड दवाएं किसी विशिष्ट ब्रांड नाम के तहत बाजार में बेची जाती हैं, जबकि जेनेरिक दवाएं संबंधित औषधीय घटक के आधार पर उपलब्ध होती हैं। दोनों ही प्रकार की दवाओं का इस्तेमाल कैंसर के उपचार में किया जाता है। ऐसे में व्यापारिक मार्जिन की सीमा को दोनों श्रेणियों तक विस्तारित करने का उद्देश्य मूल्य नियंत्रण की व्यवस्था को व्यापक बनाना है।
इसके अतिरिक्त, घरेलू स्तर पर निर्मित और विदेशों से आयात की जाने वाली दवाएं भी इस व्यवस्था के दायरे में लाई जा सकेंगी। इसी तरह पेटेंट वाली और गैर-पेटेंट वाली दवाओं को भी संबंधित प्रावधानों के अनुसार शामिल किया जा सकेगा।
इसका अर्थ है कि दवाओं की पहचान केवल इस आधार पर नहीं की जाएगी कि वे भारत में निर्मित हैं या विदेश से आयात की गई हैं, अथवा वे ब्रांडेड हैं या जेनेरिक। संबंधित दवाओं को अंतिम सूची में शामिल करने और उन पर निर्धारित नियम लागू करने की प्रक्रिया विशेषज्ञ समिति तथा एनपीपीए के माध्यम से पूरी की जाएगी।
सरकार का उद्देश्य यह है कि कैंसर के उपचार में इस्तेमाल होने वाली विभिन्न श्रेणियों की दवाओं के वितरण और बिक्री में व्यापारिक मार्जिन पर उचित सीमा लागू की जा सके। इससे बाजार में उपलब्ध अलग-अलग प्रकार की दवाओं की कीमतों को लेकर नियामकीय व्यवस्था को अधिक व्यापक बनाया जा सकता है।
दवाओं की उपलब्धता बनाए रखना भी होगा जरूरी
Cancer Drug Prices : दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण लगाने के साथ-साथ सरकार ने उनकी उपलब्धता सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया है। मंत्रालय के बयान के अनुसार, गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं का उत्पादन करने वाली कंपनियों को अपने मौजूदा उत्पादन स्तर को बनाए रखना होगा।
यह प्रावधान इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि कैंसर के उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की निरंतर उपलब्धता मरीजों के लिए आवश्यक होती है। यदि किसी दवा की कीमत कम हो जाए, लेकिन बाजार में उसकी उपलब्धता प्रभावित हो, तो मरीजों को उपचार जारी रखने में कठिनाई हो सकती है।
कैंसर के कई उपचारों में चिकित्सक द्वारा निर्धारित दवाओं को नियमित अंतराल पर लेना जरूरी होता है। ऐसी स्थिति में दवा की आपूर्ति में बाधा आने से मरीजों और उनके परिजनों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए कीमतों को नियंत्रित करने के साथ उत्पादन और आपूर्ति व्यवस्था को बनाए रखना भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सरकार की ओर से उत्पादन स्तर बनाए रखने की बात स्पष्ट करती है कि इस पहल में दवाओं की कीमतों के साथ उनकी उपलब्धता को भी ध्यान में रखा गया है। नई व्यवस्था को इस प्रकार लागू करने का प्रयास किया जाएगा कि मरीजों को अपेक्षाकृत कम कीमत पर दवाएं मिलने के साथ बाजार में उनकी आपूर्ति भी बनी रहे।
मरीजों की जेब पर कम पड़ेगा बोझ
Cancer Drug Prices : कैंसर के उपचार में दवाओं का खर्च कई परिवारों के कुल चिकित्सा बजट का बड़ा हिस्सा हो सकता है। विशेष रूप से उन मरीजों के लिए यह खर्च चुनौतीपूर्ण होता है, जिन्हें लंबे समय तक महंगी दवाओं की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे मरीजों के परिवारों को उपचार, जांच, अस्पताल आने-जाने और अन्य जरूरी खर्चों के बीच आर्थिक संतुलन बनाना पड़ता है।
केंद्र सरकार की नई पहल से संबंधित दवाओं की कीमतों में कमी आने पर मरीजों को राहत मिलने की संभावना है। सरकार ने अनुमान जताया है कि इस व्यवस्था के कारण कई कैंसर दवाओं की कीमतों में 70 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है और मरीजों को सालाना लगभग 2,500 करोड़ रुपये तक की बचत हो सकती है।
हालांकि, यह अनुमानित बचत है। प्रत्येक दवा की कीमत में समान अनुपात में कमी आएगी, ऐसा जरूरी नहीं है। वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-सी दवाएं नई व्यवस्था में शामिल की जाती हैं, उन पर वर्तमान में कितना व्यापारिक मार्जिन लागू है और अंतिम अधिसूचना के बाद कीमतों में कितना बदलाव होता है।
Cancer Drug Prices : फिर भी, सरकार का यह निर्णय कैंसर रोधी दवाओं की कीमतों को लेकर लंबे समय से उठ रही चिंताओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। इसके जरिए गैर-अनुसूचित दवाओं की आपूर्ति श्रृंखला में व्यापारिक मार्जिन को सीमित करने और मरीजों को अनावश्यक रूप से अधिक कीमत चुकाने से बचाने का प्रयास किया जा रहा है।
केंद्र सरकार की इस पहल का मुख्य उद्देश्य कैंसर के उपचार को अधिक किफायती बनाना, दवाओं की कीमतों में अत्यधिक वृद्धि पर अंकुश लगाना और मरीजों के आर्थिक बोझ को कम करना है। विशेषज्ञ समिति द्वारा दवाओं की सूची तैयार किए जाने और एनपीपीए की अंतिम अधिसूचना जारी होने के बाद यह स्पष्ट होगा कि कौन-कौन सी दवाएं इस व्यवस्था के दायरे में आएंगी। इसके बाद ही नई व्यवस्था के वास्तविक प्रभाव और मरीजों को मिलने वाली राहत का आकलन किया जा सकेगा।
Author: ohm verma
Om Verma (ohm verma) is a graduate from Motilal Nehru College of Delhi University. He has done Journalism and Mass Communication from Kurukshetra University. He has worked in Hari Bhoomi newspaper published from Haryana. After this, he worked for Dainik Jagran as Chief Sub Editor for a long time. He held many important roles in the Noida office. During this time, he participated in debates on many national TV channels.







