
निवेदिता झा, मोतिहारी। yoga : “योग और मानसिक स्वास्थ्य” अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक विषय है। यह विषय न केवल हमारे व्यक्तिगत जीवन से जुड़ा है, बल्कि आज के समय की सबसे बड़ी ज़रूरत भी बन चुका है।
हम सबसे पहले यह समझें कि योग केवल शरीर को लचीला बनाने की प्रक्रिया नहीं है। यह आत्मा, मन और शरीर के बीच संतुलन का एक ऐसा साधन है, जो हजारों वर्षों से भारतीय संस्कृति की धरोहर रहा है। यह वह विज्ञान है जो व्यक्ति को स्वयं से जोड़ता है। प्रकृति से जोड़ता है और अंततः परम तत्व से जोड़ता है।
यह है इतिहास
योग के इतिहास की बात करें तो भारत में योग ऋषि मुनियों के समय से ही योग अभ्यास होता आ रहा है। यह शारीरिक रूप से फिट रहने ओर मानसिक शांति और आध्यात्म के लिए लोग प्राचीन काल से ही योग करते आ रहे हैं। योग विद्या में भगवान शिव को आदि योगी माना जाता है यानी भगवान शिव योग के जनक थे।
वेदों के अनुसार योग जीवआत्मा से परमात्मा का मिलन है। जिस पल चित की वृत्तीय समाप्त हो जाए उस पल योग का एक कण प्रारंभ होता है। योग अहंकार को खत्म करता है। सबसे पहले योग की शुरुआत अपने देश में ही हुई थी। उसके बाद यह दुनिया भर मेवप्रचलित हो गया। जब जब योग की बात होती है तब तब महा ऋषि पतंजलि का नाम अवश्य लिया जाता है। कहा जाता है कि पतंजलि ही पहले एक मात्र व्यक्ति थे जिन्होंने योग को अंधविश्व आस्था धर्म से परे रख कर एक सुव्यवस्थित रूप दिया था।
हमें पूर्णता की ओर ले जाती है
‘योग’ शब्द संस्कृत के ‘युज’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है – जोड़ना। यानी योग वह प्रक्रिया है जो हमारे शरीर, मन और आत्मा को जोड़कर हमें पूर्णता की ओर ले जाती है। अब बात आती है कि योग दिवस प्रत्येक वर्ष 21 जून को ही क्यों मनाया जाता है। पंचांग के अनुसार इस दिन उतरी गोलार्ध का सबसे लंबा दिन होता है इसे ग्रीष्म sankarnati भी कहते हैं। इस दिन सूर्य दक्षिणायन होते हैं। इसे देवताओं की रात्रि भी कहा जाता है। दक्षिणायन होने के कारण वातावरण अशुद्ध हो जाता है। कीड़े मकोड़े उत्पन्न लगते हैं। रोग प्रतिरोधक क्षमता घटाने लगती है।
प्रति वर्ष योग दिवस भी
प्रति वर्ष हम अंतरराष्ट्रीय योग दिवस भी मनाते हैं। वर्ष 2015 में पहली बार योग दिवस मनाया गया था।जिसका श्रेय देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है, जिन्होंने खुद 69वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा में योग दिवस का प्रस्ताव रखा था। 11 दिसंबर 2014 को इसे मंजूरी मिल गई थी। दिल्ली के राज पथ पर 35000 से अधिक लोगों ने 21 जून 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ सामूहिक योग किया था। उस दिन 84 देशों के प्रतिनिधि भी वहां उपस्थित थे। ये वो ऐतिहासिक क्षण था, जिसने भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शक्ति को वैश्विक मंच पर स्थापित कर दिया।
जब 2020 में कोविड19 ने पूरे देश को भय, चिंता और परेशानी में डाल दिया तब योग ही एक मात्र सदन था जिसने लोगों को मानसिक संतुलन और आशा प्रदान की। प्राणायाम और अनुलोम विलोम जैसी विधियां फेफड़ों की क्षमता बढ़ने में अत्यंत सहायक सिद्ध हुई।
आज के युग में मानसिक स्वास्थ्य एक ऐसी समस्या बन चुकी है, जो हर उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर रही है – बच्चे, युवा, महिलाएँ, पुरुष, वरिष्ठ नागरिक – कोई भी इससे अछूता नहीं है।

- लगातार बढ़ता तनाव
- नींद की कमी
- चिंता, भय, आत्मविश्वास की कमी
- अवसाद (डिप्रेशन) और आत्मघात की प्रवृत्तियाँ
महिलाएं निभाती हैं दोहरी जिम्मेदारियां
yoga : यह सभी समस्याएँ आज आम हो चुकी हैं। महिलाओं की बात करें तो वे दोहरी ज़िम्मेदारियाँ निभाती हैं– घर की और बाहर की। समाज उनसे यह अपेक्षा करता है कि वे हर भूमिका में सर्वश्रेष्ठ हों – एक आदर्श माँ, पत्नी, बहू, कर्मचारी और साथ ही एक सशक्त नागरिक। ऐसे में उनके मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी करना, केवल उनके लिए ही नहीं, पूरे परिवार के लिए खतरे की घंटी है।
मानसिक स्वास्थ्य के लिए है जरूरी
yoga : अब बात करते हैं कि योग मानसिक स्वास्थ्य में कैसे सहायक होता है। विज्ञान और चिकित्सा दोनों ही मानते हैं कि योग मानसिक समस्याओं के लिए एक अत्यंत प्रभावशाली उपाय है।
1. प्राणायाम
प्राणायाम का अर्थ है – प्राण (श्वास) का नियमन। जब हम श्वास को नियंत्रित करते हैं तो हमारे मस्तिष्क में शांति उत्पन्न होती है। प्राणायाम से हमारे तंत्रिका तंत्र को स्थिरता मिलती है और तनाव के हार्मोन (जैसे कॉर्टिसोल) कम हो जाते हैं।
2. ध्यान (मेडिटेशन)
ध्यान मन को एकाग्र करता है। यह विचारों की भीड़ को शांत करता है। सिर्फ 10-15 मिनट का नियमित ध्यान हमारे दिनभर की ऊर्जा को सकारात्मक रूप से बदल सकता है।
3. योगासन
कुछ विशेष योगासन जैसे शशांकासन, बालासन, शवासन और भुजंगासन मानसिक तनाव को कम करने में सहायक होते हैं। ये हमारे मस्तिष्क में ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ाते हैं, जिससे मन शांत और स्थिर होता है।
4. अंदरूनी संतुलन
योग न केवल हमें बाहरी रूप से सशक्त करता है, बल्कि हमारे अंदर की भावनाओं को भी नियंत्रित करने में सहायता करता है। यह आत्मचिंतन, आत्म-स्वीकृति और आत्म-संवाद का माध्यम है।
महिलाओं के लिए योग न केवल मानसिक सशक्तीकरण का माध्यम है, बल्कि यह हार्मोनल संतुलन, मासिक धर्म की समस्याएँ, गर्भावस्था के दौरान तनाव, रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज़) से जुड़ी मानसिक परेशानियों में भी राहत देने वाला है।

स्वयं को दें समय
yoga : जब एक महिला योग करती है तो वह स्वयं को समय देती है। यह “सेल्फ-केयर” का सबसे प्रभावशाली और सुंदर तरीका है। जब एक महिला स्वस्थ होती है तो पूरा परिवार स्वस्थ होता है।
आज मेडिकल साइंस भी योग को डिप्रेशन, एंग्जायटी, PTSD, और अन्य मानसिक विकारों के उपचार में उपयोगी मानता है। कई मानसिक चिकित्सकों ने अपने उपचार में योग और ध्यान को सम्मिलित करना प्रारंभ कर दिया है।
जब हम नियमित योग करते हैं तो मन अधिक स्थिर रहता है। कार्यों में ज़्यादा केंद्रित और सकारात्मकता रहती है और जीवन के प्रति दृष्टिकोण अधिक संतुलित हो जाता है। दिन में सिर्फ 15 से 20 मिनट स्वयं के लिए निकालिए। एक शांत कोना चुनिए, अपने शरीर और मन से जुड़िए। यही योग है।
न पालें तनाव
yoga : तनाव को मत पालिए, योग को अपनाइए। मन को शांत रखिए, जीवन को सरल बनाइए। योग न कोई धर्म है, न ही कोई फैशन। यह जीवन जीने की एक सुंदर, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक विधि है। आइए, इसे अपनाएँ और अपने मानसिक स्वास्थ्य को सशक्त बनाएँ।
Author: Nivedita Jha
Nivedita Jha is a graduate from Baba Saheb Bhimrao Ambedkar University. She is also a double post graduate. She has also done journalism. She has five years of experience in journalism.







