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Nepal Protest Case : नेपाल में ‘जेनजी आंदोलन’ का बड़ा खुलासा, पूर्व पीएम ओली समेत शीर्ष नेताओं पर मुकदमे की सिफारिश

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Nepal Protest Case: Charges Recommended Against Former PM KP Sharma Oli

Nepal Protest Case : जांच आयोग की रिपोर्ट ने मचाया राजनीतिक भूचाल

काठमांडू, 25 मार्च। Nepal Protest Case : नेपाल में पिछले वर्ष हुए चर्चित ‘जेनजी आंदोलन’ से जुड़े घटनाक्रमों ने अब एक नया और गंभीर मोड़ ले लिया है। इस आंदोलन के दौरान हुई हिंसा, जनहानि और व्यापक संपत्ति नुकसान की जांच के लिए गठित उच्चस्तरीय आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कई बड़े और चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। इस रिपोर्ट के आधार पर नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक और तत्कालीन पुलिस प्रमुख चंद्र कुबेर खापुंग के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने की सिफारिश की गई है।

गौरीबहादुर कार्की थे जांच आयोग के अध्यक्ष

Nepal Protest Case : यह जांच आयोग गौरीबहादुर कार्की की अध्यक्षता में गठित किया गया था, जिसका उद्देश्य 8 सितंबर को हुए हिंसक प्रदर्शनों के दौरान हुई मौतों और प्रशासनिक कार्रवाई की पड़ताल करना था। आयोग ने अपनी जांच में पाया कि उस समय की सरकार और प्रशासन ने हालात को संभालने में गंभीर लापरवाही बरती। विशेष रूप से पूर्व प्रधानमंत्री ओली और गृह मंत्री लेखक के निर्णयों और रवैये को गैर-जिम्मेदाराना बताया गया है।

मौतों के पीछे प्रशासनिक विफलता

Nepal Protest Case :  आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शनकारियों की मौतों के पीछे प्रशासनिक विफलता और समय पर उचित कदम न उठाना मुख्य कारण रहा। इसी आधार पर आयोग ने इन दोनों नेताओं के खिलाफ नेपाल के मुलुकी आपराधिक संहिता अधिनियम, 2074 (2017) के तहत कानूनी कार्रवाई की सिफारिश की है। इसके साथ ही तत्कालीन पुलिस प्रमुख चंद्र कुबेर खापुंग को भी दोषी ठहराया गया है, जिन पर आरोप है कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग का आदेश दिया, जिससे हालात और बिगड़ गए।

हो सकती है दस वर्ष तक की सजा

Nepal Protest Case : यदि आयोग की सिफारिशों के आधार पर मुकदमा दर्ज होता है और आरोप सिद्ध होते हैं तो इन तीनों शीर्ष अधिकारियों को तीन से दस साल तक की सजा हो सकती है। इसके अलावा अधिकतम 30 हजार नेपाली रुपये तक का जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

लीक कापी फैल रही तेजी से

हालांकि, यह रिपोर्ट अभी तक आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन इसकी एक लीक कॉपी तेजी से फैल रही है, जिससे देशभर में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इस लीक रिपोर्ट ने सरकार, प्रशासन और न्यायिक प्रक्रिया को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

बचाव में ओली ने यह कहा

Nepal Protest Case : आयोग के सामने अपने बचाव में पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने कहा कि उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि वे जान-माल के नुकसान को कम करें और प्रदर्शन में किसी भी अवांछित तत्व की घुसपैठ को रोकें। उन्होंने यह भी दावा किया कि सरकार की मंशा स्थिति को नियंत्रित करने की थी, न कि उसे बिगाड़ने की। हालांकि, आयोग ने उनके इस तर्क को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया।

सबसे उग्र आंदोलन

Nepal Protest Case :  सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जेनजी आंदोलन नेपाल के हालिया इतिहास के सबसे उग्र आंदोलनों में से एक था। इस आंदोलन के दौरान कुल 77 लोगों की जान गई और 85 अरब नेपाली रुपये से अधिक की संपत्ति नष्ट हो गई। इस हिंसक आंदोलन के कारण ही ओली के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार गिर गई थी, जिससे देश में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ गई।

नेपाल में नयी व्यवस्था

Nepal Protest Case : सरकार के पतन के बाद नेपाल में एक नई व्यवस्था लागू की गई। सुशीला कार्की के नेतृत्व में एक गैर-राजनीतिक अंतरिम प्रशासन का गठन किया गया, जिसने 5 मार्च को प्रतिनिधि सभा के चुनाव संपन्न कराए। इन चुनावों में पारंपरिक राजनीतिक दलों को करारी हार का सामना करना पड़ा, जबकि बालेन शाह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने लगभग दो-तिहाई बहुमत हासिल कर संसद में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आई।

रिपोर्ट लीक होने का समय महत्वपूर्ण

Nepal Protest Case : रिपोर्ट के लीक होने का समय भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नए प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण से ठीक दो दिन पहले इसका सामने आना इस बात का संकेत देता है कि आने वाली सरकार पर अब इस मामले में सख्त कार्रवाई करने का दबाव बढ़ सकता है। जनता और राजनीतिक विश्लेषकों की नजर अब इस बात पर है कि नई सरकार इन सिफारिशों पर क्या कदम उठाती है।

कई और अधिकारी भी जांच के दायरे में

Nepal Protest Case : आयोग ने केवल शीर्ष नेताओं को ही नहीं, बल्कि कई अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को भी जांच के दायरे में लाने की सिफारिश की है। इनमें तत्कालीन गृह सचिव गोकरण मणि दुवाडी, सशस्त्र पुलिस बल के प्रमुख राजु अर्याल, राष्ट्रीय जांच विभाग के पूर्व प्रमुख हुतराज थापा और काठमांडू के पूर्व मुख्य जिला अधिकारी छवि राज रिजाल शामिल हैं। इन सभी पर लापरवाही और गैर-जिम्मेदारी के आरोप लगाए गए हैं।

यदि इन अधिकारियों के खिलाफ भी मुकदमा चलता है तो उन्हें अधिकतम तीन साल की सजा और 30 हजार नेपाली रुपए तक का जुर्माना हो सकता है। इसके अलावा आयोग ने नेपाल पुलिस, सशस्त्र पुलिस बल और राष्ट्रीय जांच विभाग के कई अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की भी सिफारिश की है।

नेपाल की राजनीति में बड़ा कदम

यह पूरा घटनाक्रम नेपाल की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। अब यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि क्या इस रिपोर्ट के आधार पर वास्तव में कार्रवाई होती है या यह मामला भी राजनीतिक खींचतान में उलझकर रह जाता है।

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