कोलकाता, 23 दिसंबर। Murshidabad riot verdict : पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में वक्फ संशोधन अधिनियम के खिलाफ अप्रैल में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुए पिता–पुत्र हत्याकांड मामले में जंगीपुर सब-डिवीजन अदालत ने 13 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है।
सभी आरोपितों को ठहराया था दोषी
Murshidabad riot verdict : जंगीपुर सब-डिवीजन अदालत के न्यायाधीश अमिताभ मुखोपाध्याय ने सोमवार को सभी आरोपितों को दोषी ठहराया था। मंगलवार को अदालत परिसर में कड़ी सुरक्षा के बीच सजा सुनाई गई।
मृतक हरगोबिंदो दास और उनके बेटे चंदन दास जंगीपुर पुलिस जिले के समसेरगंज थाना क्षेत्र के जाफराबाद गांव के निवासी थे।
सजा पाने वालों के नाम
Murshidabad riot verdict : उम्रकैद पाने वाले दोषियों के नाम इस प्रकार हैं— दिलदार नादब, अस्माउल नादब, इंजामुल हक, जियाउल हक, फेखरुल शेख, आज़फरुल शेख, मुनिरुल शेख, इकबाल शेख, नूरुल शेख, सबा करीम, हजरत शेख, अकबर अली और यूसुफ शेख।
न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा कि इस हत्याकांड के पीछे राजनीतिक कारण नहीं थे, बल्कि यह व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था।
भाजपा का आरोप, लोगों को गुमराह किया गया
Murshidabad riot verdict : वहीं भाजपा ने आरोप लगाया कि न्यायाधीश की टिप्पणी से स्पष्ट होता है कि वक्फ संशोधन अधिनियम के विरोध की आड़ लेकर लोगों को गुमराह किया गया और वास्तविक उद्देश्य को छिपाने की कोशिश की गई।
राज्य पुलिस की विशेष जांच टीम (एसआइटी) ने सभी 13 आरोपितों को अलग-अलग गिरफ्तार किया था। इस मामले में एसआइटी ने लगभग 900 पन्नों का आरोपपत्र भी अदालत में दाखिल किया था, जिसमें हमले को पूर्व-नियोजित बताया गया।
राज्य सरकार के मुआवजे को ठुकरा दिया था
Murshidabad riot verdict : आरोपपत्र के अनुसार, दोनों की हत्या गांव में दंगे रोकने के प्रयास के दौरान की गई थी। मृतकों के परिजनों ने राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित मुआवजे को ठुकरा दिया था, लेकिन विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी द्वारा प्रस्तावित मुआवजे को स्वीकार कर लिया।
बनाई गई थी एसआइटी
Murshidabad riot verdict : अप्रैल में कलकत्ता हाईकोर्ट ने मुर्शिदाबाद दंगों की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआइटी) बनाने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने क्षेत्र में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) की तैनाती का आदेश भी दिया था।
न्यायमूर्ति सौमेन सेन और न्यायमूर्ति राजा बसु चौधरी की खंडपीठ ने टिप्पणी की थी कि दंगों पर नियंत्रण के लिए राज्य सरकार के कदम अपर्याप्त थे और यदि सीएपीएफ पहले तैनात की जाती तो स्थिति इतनी गंभीर और अस्थिर नहीं होती।







