नई दिल्ली, 6 सितंबर। Digital Footprints : सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उत्तर प्रदेश की गाजियाबाद पुलिस से यह स्पष्ट करने को कहा कि लखनऊ के पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के खिलाफ दर्ज सड़क विवाद (रोड-रेज) के मामले की जांच के लिए उनके डिजिटल फुटप्रिंट की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ रही है। पत्रकार ने अयोध्या स्थित राम मंदिर में कथित दान की हेराफेरी और अनियमितताओं से जुड़ी खबरों को प्रमुखता से उठाया था। इसके बाद उनके खिलाफ दर्ज मामले और जांच के तौर-तरीकों को लेकर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन भी शामिल थे। पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की ओर से दाखिल याचिका में गाजियाबाद पुलिस द्वारा उनके खिलाफ दर्ज एफआइआर को चुनौती दी गई है। यह एफआइआर कथित तौर पर 18 अगस्त को हुई एक रोड-रेज की घटना से संबंधित है।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि गाजियाबाद पुलिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ से जून 2026 से ही उनके डिजिटल फुटप्रिंट और अन्य डिजिटल जानकारी उपलब्ध कराने की मांग की है। इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस से सवाल किया कि सड़क पर हुए विवाद के मामले की जांच में पत्रकार की डिजिटल गतिविधियों अथवा डिजिटल फुटप्रिंट की इतनी आवश्यकता क्यों है।
Digital Footprints : सुनवाई के दौरान पीठ ने पुलिस के वकील से सवाल करते हुए कहा, “रोड-रेज के मामले में आपको उसके डिजिटल फुटप्रिंट की आवश्यकता क्यों है?” अदालत ने पुलिस से यह भी स्पष्ट करने को कहा कि जांच के उद्देश्य से ‘एक्स’ से किस तरह की जानकारी मांगी जा रही है।
पीठ ने गाजियाबाद के पुलिस आयुक्त को निर्देश दिया कि वह यह स्पष्ट करें कि रोड-रेज एफआइआर या याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज किसी अन्य एफआइआर की जांच के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से किस प्रकार की जानकारी मांगी गई है। अदालत ने कहा कि पुलिस को डिजिटल जानकारी मांगने के उद्देश्य और उसकी सीमा को स्पष्ट करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि डिजिटल फुटप्रिंट से संबंधित जानकारी मांगने का आवेदन या अनुरोध अगली सुनवाई की तारीख तक सार्वजनिक डोमेन में नहीं लाया जाए। अदालत ने डिजिटल डेटा की मांग से जुड़े दस्तावेजों को लेकर भी सावधानी बरतने पर जोर दिया।
यूपी सरकार ने बताया—पत्रकार के खिलाफ दो अन्य मामले भी लंबित
गाजियाबाद पुलिस की ओर से उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त महाधिवक्ता शरण देव सिंह ठाकुर अदालत में पेश हुए। उन्होंने बताया कि अभिषेक उपाध्याय के खिलाफ दो अन्य मामले भी जांच के दायरे में हैं। ये मामले कथित रूप से मानहानि की शिकायतों से संबंधित हैं।
ठाकुर ने पत्रकार की याचिका में लगाए गए उन आरोपों पर भी आपत्ति जताई, जिनमें कहा गया था कि रोड-रेज की एफआइआर अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ाए गए दान से संबंधित कथित अनियमितताओं की उनकी रिपोर्टिंग के कारण बदले की भावना से दर्ज की गई।
उत्तर प्रदेश सरकार के वकील ने याचिका में लगाए गए इन आरोपों को “जंगली आरोप” करार देते हुए उनका विरोध किया।
सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि पुलिस की जांच केवल रोड-रेज की घटना तक सीमित नहीं है और पत्रकार के खिलाफ अन्य शिकायतों की भी जांच चल रही है।
अदालत ने कहा—डिजिटल जानकारी की मांग की सीमा और पैरामीटर तय होने चाहिए।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि फिलहाल अदालत के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि पुलिस द्वारा डिजिटल फुटप्रिंट मांगने की सीमा और उसके पैरामीटर क्या होने चाहिए।
पीठ ने कहा कि जांच एजेंसियों को किसी मामले की तह तक पहुंचने के लिए आवश्यक जानकारी जुटाने का अधिकार है, लेकिन डिजिटल डेटा हासिल करने की प्रक्रिया में निजता के अधिकार को भी ध्यान में रखना होगा।
संतुलन बनाए रखना जरूरी
Digital Footprints : अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि किसी आरोपी के निजता के अधिकार और पीड़ित के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। साथ ही जांच एजेंसी को किसी मामले की पूरी और निष्पक्ष जांच करने का अवसर भी मिलना चाहिए।
पीठ ने स्पष्ट किया कि डिजिटल फुटप्रिंट से जुड़ी जानकारी एकत्र करने का मुद्दा संवेदनशील है और इसके लिए उचित संतुलन की आवश्यकता है। अदालत के अनुसार, जांच के दौरान ऐसी जानकारी मांगी जा सकती है, लेकिन उसकी जरूरत, सीमा और उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए।
प्रत्यक्षदर्शी का बयान जांच में शामिल
Digital Footprints : उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता शरण देव सिंह ठाकुर ने अदालत को यह भी बताया कि रोड-रेज मामले में एक प्रत्यक्षदर्शी का बयान मौजूद है और पुलिस उस बयान के आधार पर भी मामले की जांच कर रही है।
उन्होंने कहा कि जांच के दौरान यदि पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के खिलाफ कुछ भी नहीं पाया जाता है तो उनके खिलाफ दर्ज मामला बंद कर दिया जाएगा।
इस पर अदालत ने जांच की निष्पक्षता और प्रक्रिया को लेकर अपना ध्यान केंद्रित रखा। अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि डिजिटल जानकारी हासिल करने की कार्रवाई किसी व्यक्ति की निजता के अधिकार का अनावश्यक उल्लंघन न करे।
पत्रकार की ओर से पुलिस के लिए दिशा-निर्देश तय करने की मांग
Digital Footprints : अभिषेक उपाध्याय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप राय और अधिवक्ता अनूप प्रकाश अवस्थी अदालत में पेश हुए। पत्रकार की ओर से दलील दी गई कि ऐसे मामलों में पुलिस द्वारा डिजिटल फुटप्रिंट मांगने की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट को स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करने चाहिए।
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप राय ने अदालत से आग्रह किया कि डिजिटल जानकारी मांगने और हासिल करने के मामलों में पुलिस के लिए स्पष्ट नियम और सीमाएं निर्धारित की जाएं, ताकि जांच के नाम पर किसी व्यक्ति की निजी डिजिटल जानकारी का अनावश्यक इस्तेमाल न हो।
याचिका में अभिषेक उपाध्याय ने गाजियाबाद पुलिस द्वारा दर्ज एफआइआर को रद करने की मांग की है। वैकल्पिक रूप से उन्होंने मामले की जांच उत्तर प्रदेश पुलिस से हटाकर किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी, जैसे केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ), को सौंपने का अनुरोध किया है।
गिरफ्तारी और शारीरिक नुकसान की आशंका जताई
Digital Footprints : याचिका में अभिषेक उपाध्याय ने आशंका जताई है कि उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है या उत्तर प्रदेश में राज्य तंत्र से जुड़े कथित लोगों द्वारा उन्हें शारीरिक नुकसान पहुंचाया जा सकता है। उन्होंने कहा है कि प्रभावी न्यायिक संरक्षण मिलने से पहले उनके खिलाफ इस तरह की कार्रवाई की आशंका बनी हुई है।
हालांकि, अदालत ने तत्काल राहत के तौर पर पहले दी गई गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा को जारी रखा है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 25 अगस्त को अभिषेक उपाध्याय को गिरफ्तारी से मिली अंतरिम सुरक्षा अगली सुनवाई की तारीख तक जारी रहेगी।
इस मामले में अदालत के सामने अब मुख्य सवाल यह है कि सड़क विवाद जैसे आपराधिक मामले की जांच में किसी पत्रकार की डिजिटल जानकारी किस सीमा तक हासिल की जा सकती है और पुलिस को ऐसी जानकारी मांगने के लिए किन स्पष्ट मानकों का पालन करना चाहिए। साथ ही अदालत इस बात पर भी विचार कर रही है कि जांच की जरूरत और व्यक्ति की निजता के संवैधानिक अधिकार के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी डिजिटल निजता, पुलिस जांच और सोशल मीडिया डेटा के इस्तेमाल के बीच बढ़ते कानूनी सवालों के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।






