निवेदिता झा, नई दिल्ली। Delhi Gharana Legend : दिल्ली… एक शहर नहीं, एक अहसास। दाग़ देहलवी और मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी से लेकर तहज़ीब की महीन खुशबू तक—इस शहर की आत्मा शब्दों और सुरों में बसती है। इसी आत्मा को अपनी आवाज़ में ढालने वाले विरले फनकारों में एक नाम था—उस्ताद इकबाल अहमद खान। दिल्ली घराने के इस महान गायक के सुरों में जैसे शहर की धड़कन धड़कती थी और उनके अलाप में दिल्ली की सदियों पुरानी रिवायतें गूंज उठती थीं।
दिल में उतरती आवाज
Delhi Gharana Legend : जब उस्ताद महफ़िल में बैठते, तो खयाल गायन विद्वत्ता की ऊंचाइयों को छूता और ठुमरी, दादरा, टप्पा व ग़ज़लें सीधे दिल में उतर जातीं। वे खयाल के उस्ताद थे, लेकिन उप-शास्त्रीय संगीत में उनकी महारत उन्हें भीड़ से बिल्कुल अलग खड़ा कर देती थी। उनकी ठुमरी में दिल्ली घराने की वह नज़ाकत थी, जो बिना शोर किए श्रोताओं को राग की आत्मा तक ले जाती थी।
यह थी अनोखी खासियत
Delhi Gharana Legend : उनके व्यक्तित्व की एक अनोखी खासियत थी— कलाकार और शिक्षक के बीच निरंतर चलती एक रचनात्मक जद्दोजहद। कभी मंच पर फनकार पूरी तरह हावी होता, तो कभी भीतर का गुरु रागों के सूक्ष्म नियमों की याद दिलाता। आलोचकों का मानना था कि जब वे सिद्धांतों की व्याख्या से मुक्त होकर गाते थे, तब उनका कलाकार रूप अपनी पूरी चमक में सामने आता था।
विरासत का संरक्षण
Delhi Gharana Legend : उस्ताद इकबाल अहमद खान के लिए गायन केवल प्रस्तुति नहीं, बल्कि विरासत का संरक्षण था। उनकी डिस्कोग्राफी में अमीर खुसरो द्वारा रचित दुर्लभ तराने शामिल हैं, जैसे ‘चांदनी केदार तराना’, जो इतिहास को सुरों में संजोने का सजीव प्रमाण हैं। 1966 से शुरू हुआ उनका संगीत-सफर पांच दशकों से भी अधिक समय तक श्रोताओं को रससिक्त करता रहा।
संगीत की गहरी सीख यहां से मिली
Delhi Gharana Legend : संगीत की पहली और सबसे गहरी सीख उन्हें अपने नाना, संगीत मार्तंड उस्ताद चांद खान साहब से मिली। यह उनकी सौभाग्यशाली वंश परंपरा थी कि एक ही घराने में उन्हें दादा, परदादा, चाचा—उस्ताद हिलाल अहमद खान, उस्ताद नसीर अहमद खान, उस्ताद जफर अहमद खान—और पिता उस्ताद जहूर अहमद खान जैसे महान उस्तादों से तालीम पाने का अवसर मिला।
दिल्ली दरबार की स्थापना
Delhi Gharana Legend : इसी कठोर साधना के दम पर वे आकाशवाणी के शीर्ष-ग्रेड गायक बने। लेकिन मंच ही उनकी मंज़िल नहीं था। उन्होंने ‘दिल्ली दरबार’ की स्थापना कर भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रचार-प्रसार को एक नई दिशा दी। मीडिया और थिएटर के लिए भी उन्होंने संगीत रचा—टीवी धारावाहिक इंद्र सभा, वृत्तचित्र याद-ए-गालिब और यहां तक कि भारत सरकार के ई-गवर्नेंस प्रभाग के लिए गुलज़ार द्वारा लिखे गीत को भी सुरों में ढाला।
उनकी साधना और साध्य को देश ने बड़े सम्मान दिए—मिर्ज़ा ग़ालिब पुरस्कार (2008) और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (2014) जैसे राष्ट्रीय सम्मानों ने उनके योगदान पर मुहर लगाई।
एक सच्चे उस्ताद की पहचान उसके शिष्यों से भी होती है। डॉ. अंजली मित्तल और सोनिया मिश्रा जैसे शिष्य उनके मार्गदर्शन में तैयार हुए, जिन्होंने अमेरिका सहित अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिल्ली घराने की खुशबू बिखेरी।
संगीतकारों के प्रति बेहद संवेदनशील
Delhi Gharana Legend : 17 दिसंबर 2020 को जब उस्ताद इकबाल अहमद खान इस दुनिया से विदा हुए, तो यह केवल एक कलाकार का जाना नहीं था, बल्कि एक संरक्षक, एक परंपरा और एक दौर का अवसान था। उनके निधन पर उस्ताद अमजद अली खान ने कहा था— “दिल्ली घराने के प्रमुख उस्ताद इकबाल अहमद खान साहब के जाने से स्तब्ध और दुखी हूं। उनसे मेरी थोड़ी बातचीत हुई थी, लेकिन वह संगीत और संगीतकारों के प्रति बेहद संवेदनशील और करुणामय लगे।”
आज भी दिल्ली की फिज़ा में कहीं न कहीं उनके सुर तैरते हैं—याद दिलाते हुए कि कुछ आवाज़ें कभी खामोश नहीं होतीं।
Author: Nivedita Jha
Nivedita Jha is a graduate from Baba Saheb Bhimrao Ambedkar University. She is also a double post graduate. She has also done journalism. She has five years of experience in journalism.







