ओम वर्मा, मोतिहारी। Champaran Satyagraha :
चंपारण के गांधी और गांधी का चंपारण। यह वाक्य हर चंपारणवासी के जेहन में मौजूद है। गांधी को याद कर आज हर चंपारणवासी गौरव का अनुभव करता है। और करे भी क्यों नही। गांधी ने ही अत्याचार के खिलाफ आवाज उठना सिखाया था और वो भी बिना हथियार उठाए। आज 107 बरस बीत गए। चंपारण सत्याग्रह आंदोलन के। इतिहास के पन्नों में दर्ज वो 10 अप्रैल, 1917, इसी दिन चंपारण को कर्मभूमि बना चुके गांधी ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को नयी दिशा दी। चंपारण सत्याग्रह की शुरुआत की। जो भारत में उनके नेतृत्व में पहला सत्याग्रह आंदोलन था। यह आंदोलन किसानों के शोषण के खिलाफ था, जो नील की खेती के लिए मजबूर किए जा रहे थे।
यहां से हुई शुरूआत
चंपारण सत्याग्रह की शुरुआत बिहार के चंपारण जिले से हुई, जहां ब्रिटिश बागान मालिक किसानों को नील की खेती के लिए बाध्य करते थे। इस शोषण की खबर मिलते ही महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद चंपारण पहुंचे। उन्होंने देखा कि किसानों की आजीविका छीनी जा रही है और उन्हें अन्याय सहना पड़ रहा है। इसके खिलाफ गांधीजी ने सत्याग्रह शुरू किया। इस आंदोलन में न गोली चली, न लाठी चली, न जुलूस निकले, न बड़ी सभाएं हुईं। फिर भी यह ब्रिटिश शासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया।
गांधी जी की हुई गिरफ्तारी
गांधीजी ने स्थानीय किसानों के साथ मिलकर उनकी समस्याओं को समझा और ब्रिटिश प्रशासन के सामने उनकी मांगें रखीं। इस दौरान उनकी गिरफ्तारी भी हुई, लेकिन उन्होंने जमानत लेने से इनकार कर दिया। उनका यह कदम जनता में एक नई चेतना जगा गया। गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में आजमाए गए सत्याग्रह के अपने अनुभव को भारत की धरती पर पहली बार चंपारण में उतारा। इस आंदोलन ने न केवल किसानों को शोषण से मुक्ति दिलाई, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में युवाओं को एक नई प्रेरणा भी दी।
रंग लाई गांधी जी की मेहनत
गांधीजी की मेहनत रंग लाई। 4 मार्च, 1918 को ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा और चंपारण कृषि अधिनियम पारित हुआ। इस अधिनियम ने किसानों को नील की खेती के शोषण से मुक्ति दिलाई।
चंपारण सत्याग्रह गांधीजी के नेतृत्व में भारत का पहला बड़ा जन आंदोलन था, जिसने साबित किया कि अहिंसा और सत्य के बल पर भी अन्याय के खिलाफ लड़ाई जीती जा सकती है। 107 साल बाद भी यह घटना हमें सिखाती है कि एकजुटता और संकल्प के साथ हर चुनौती का सामना किया जा सकता है।
मोतिहारी निवासी व स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय रामऔतार प्रसाद वर्मा के पौत्र सौरभ वर्मा ने बताया कि आज हमें खुशी है कि चंपारण में गांधी जी ने अंग्रेजों के अत्याचार के यहां के लोगों को मुक्ति दिलाई थी। गांधी जी का चंपारण आना और यहां की भूमि को कर्मक्षेत्र बनाना सभी चंपारण वासियों को गौरवान्वित करता है। आज चंपारण अपने गांधी जी को बहुत याद करता है।







