Champaran Satyagraha : दीक्षांत समारोह में उपराष्ट्रपति का संबोधन
मोतिहारी, 4 अप्रैल। Champaran Satyagraha : भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के ऐतिहासिक शहर मोतिहारी में स्थित महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के तृतीय दीक्षांत समारोह में शनिवार को मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया और विद्यार्थियों, शिक्षकों तथा उपस्थित जनसमूह को संबोधित किया। अपने विस्तृत और प्रेरणादायक संबोधन में उन्होंने चंपारण सत्याग्रह के ऐतिहासिक महत्व, महात्मा गांधी के आदर्शों और आधुनिक भारत के निर्माण में युवाओं की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला।

चरखा पार्क का दौरा
Champaran Satyagraha : कार्यक्रम के दौरान उपराष्ट्रपति ने चरखा पार्क और महात्मा गांधी सत्याग्रह स्मारक का भी दौरा किया। उन्होंने वहां महात्मा गांधी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी और उनके द्वारा दिए गए सत्य, अहिंसा और राष्ट्रसेवा के अमर संदेश को स्मरण किया। उन्होंने कहा कि गांधीजी के विचार केवल इतिहास तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आज भी समाज और राष्ट्र के मार्गदर्शन के लिए उतने ही प्रासंगिक हैं।
चंपारण का विशिष्ट स्थान
Champaran Satyagraha : उपराष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि चंपारण का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट स्थान है। यहीं से महात्मा गांधी ने भारत में अपने पहले बड़े जनआंदोलन की शुरुआत की थी, जिसने न केवल अंग्रेजी शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों को चुनौती दी, बल्कि देशवासियों के भीतर आत्मसम्मान, साहस और न्याय के प्रति जागरूकता भी उत्पन्न की। उन्होंने कहा कि चंपारण सत्याग्रह ने सत्य, साहस और न्याय के माध्यम से राष्ट्र की अंतरात्मा को झकझोर कर उसे जागृत करने का कार्य किया।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि चंपारण की धरती ने महात्मा गांधी को एक साधारण बैरिस्टर से जननेता बनने की दिशा में प्रेरित किया। यहां उन्होंने भारत के ग्रामीण जीवन, किसानों की पीड़ा और सामाजिक असमानताओं को करीब से देखा और समझा, जिसके परिणामस्वरूप उनके नेतृत्व में एक व्यापक जनआंदोलन खड़ा हुआ जिसने स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी।

यह भूमि अत्यंत पवित्र
Champaran Satyagraha : बिहार की गौरवशाली ऐतिहासिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विरासत का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह भूमि अत्यंत पवित्र और प्रेरणादायक रही है। यहीं पर भगवान गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई, जिसने विश्व को शांति और करुणा का संदेश दिया। इसी प्रदेश में स्थित प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय एक समय वैश्विक शिक्षा और ज्ञान का प्रमुख केंद्र था, जहां दुनिया भर से विद्यार्थी अध्ययन के लिए आते थे। इसके अलावा, इसी भूमि ने चाणक्य जैसे महान दार्शनिक, अर्थशास्त्री और राजनीतिक विचारक को जन्म दिया, जिनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं।
महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के नामकरण को अत्यंत सार्थक और प्रतीकात्मक बताते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह नाम गांधीजी के आदर्शों—सामाजिक न्याय, ग्रामीण विकास, नैतिक नेतृत्व और मानवता की सेवा—के प्रति संस्थान की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि इस विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल शिक्षा प्रदान करना नहीं, बल्कि ऐसे नागरिक तैयार करना भी है जो समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकें।

महारानी जानकी कुंवर को याद किया
Champaran Satyagraha : अपने भाषण में उन्होंने महारानी जानकी कुंवर के योगदान को भी विशेष रूप से याद किया। उन्होंने कहा कि महारानी जानकी कुंवर का परोपकार और उनके द्वारा किया गया भूमि दान इस क्षेत्र में शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। उनकी दूरदर्शिता और उदारता ने शिक्षा के क्षेत्र में एक मजबूत नींव रखी, जिसका लाभ आज हजारों विद्यार्थी उठा रहे हैं।
उपराष्ट्रपति ने यह जानकर संतोष व्यक्त किया कि विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को सफलतापूर्वक लागू किया है और इसके तहत नवीन एवं एकीकृत पाठ्यक्रमों की शुरुआत की गई है। उन्होंने कहा कि यह कदम विद्यार्थियों को बहुआयामी ज्ञान और कौशल प्रदान करने में सहायक होगा। इसके साथ ही उन्होंने विश्वविद्यालय द्वारा फिट इंडिया मूवमेंट के अंतर्गत भारतीय ज्ञान प्रणाली केंद्र की स्थापना और खेल एवं शारीरिक फिटनेस को बढ़ावा देने के प्रयासों की भी सराहना की।
महिला सशक्तीकरण की चर्चा
Champaran Satyagraha : उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर प्रसन्नता जताई कि विश्वविद्यालय में स्नातक और स्नातकोत्तर दोनों स्तरों पर छात्राओं ने शीर्ष स्थान प्राप्त किए हैं। उन्होंने इसे भारत में महिलाओं के बढ़ते सशक्तीकरण और नेतृत्व क्षमता का स्पष्ट प्रमाण बताया और कहा कि यह देश के समग्र विकास के लिए एक सकारात्मक संकेत है।

निरंतर सीखते रहें
स्नातक विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि दीक्षांत समारोह केवल शैक्षणिक यात्रा का समापन नहीं, बल्कि एक नई और आजीवन सीखने की यात्रा की शुरुआत है। उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि वे जीवन में निरंतर सीखते रहें, नए कौशल विकसित करें और बदलती परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालें।
तकनीक का प्रयोग सकारात्मक उद्देश्य के लिए करें
Champaran Satyagraha : उन्होंने कहा कि आज का युग तेजी से बदलती प्रौद्योगिकी का युग है, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस, मशीन लर्निंग और डिजिटल तकनीकों ने नवाचार और विकास के नए द्वार खोल दिए हैं। ऐसे में युवाओं की जिम्मेदारी है कि वे इन तकनीकों का उपयोग सकारात्मक और रचनात्मक उद्देश्यों के लिए करें तथा राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएं।
उपराष्ट्रपति ने युवाओं से ‘राष्ट्र प्रथम’ के सिद्धांत को अपने जीवन में अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि हर निर्णय और हर कार्य में देशहित सर्वोपरि होना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने युवाओं से मादक द्रव्यों के सेवन के खिलाफ सख्त रुख अपनाने और एक स्वस्थ, सशक्त एवं जागरूक समाज के निर्माण में योगदान देने की अपील की।
गांधीजी का अहिंसा का मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत की प्रासंगिकता पर जोर देते हुए कहा कि आज के समय में, जब दुनिया कई प्रकार के संघर्षों और तनावों से जूझ रही है, गांधीजी का अहिंसा का मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। उन्होंने कहा कि यह सिद्धांत केवल हमारे व्यवहार और कार्यों तक ही सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि डिजिटल दुनिया में भी हमारी भाषा और आचरण को मार्गदर्शन प्रदान करना चाहिए।







