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Fifteen Crore Poem : प्रसाद रत्नेश्वर की रचना : पंद्रह करोड़ की कविता

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Fifteen Crore Poem

Fifteen Crore Poem :

पंद्रह सौ
पंद्रह हज़ार
पंद्रह लाख
या
पंद्रह अरब
क्यों नहीं
पंद्रह करोड़ क्यों
ब्रह्म जानें

बनाना ही था
लेखकों का मज़ाक
पुस्तक मेले में प्रतीक्षारत
पुस्तकों को
बतानी थी औक़ात
तो ‘ मैं ‘ के प्रदर्शन के लिए
बिल्कुल सही जगह है यह

Fifteen Crore Poem :

हमलोग कर सकते हैं
करना चाहिए था
रखना था पंद्रह किलो का एक पत्थर
‘ मैं ‘ की घेराबंदी के बहुत पास
ऊपर से रोली अगरबत्ती फूल – मालाएँ
दर्शनार्थियों का शक बदल जाता
यक़ीन में
परिक्रमा करते
समझ कर करोड़ी देवता
माँगते मन्नतें
चढ़ाते चढ़ावा
आ सकता पंद्रह करोड़
‘ मैं बाबा की जय ‘ के साथ लगाते नारे
मंदिर यहीं बनायेंगे

मुझे बहुत याद आ रहे हैं
वेदव्यास तुलसीदास
सुर कबीर जायसी
बिहार के रेणु दिनकर भी
नहीं आता था
बेचना उन्हें
या रचना सर्वश्रेष्ठ
‘ मैं ‘ की तरह !

। मैं भी रत्नेश्वर
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# प्रसाद रत्नेश्वर
88048 09100

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