कोलकाता, 18 सितंबर। Trinamool Congress Split : पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस को लेकर चल रहे संगठनात्मक विवाद के बीच दोनों गुटों ने अपने-अपने नए पार्टी नाम और चुनाव चिह्न के विकल्प चुनाव आयोग को सौंप दिए हैं। आयोग की ओर से निर्धारित समय सीमा के भीतर दोनों पक्षों ने अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न के विकल्प प्रस्तुत किए हैं। अब चुनाव आयोग इन विकल्पों पर विचार करने के बाद दोनों गुटों के लिए नए नाम और चुनाव चिह्न को अंतिम रूप देगा।
मौजूदा विवाद के बाद तृणमूल कांग्रेस दो अलग-अलग गुटों में बंटी हुई है। एक गुट का नेतृत्व पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी कर रहे हैं। इस गुट को पार्टी का ‘मूल लेकिन अल्पमत’ वाला धड़ा बताया जा रहा है। वहीं, दूसरा गुट पार्टी से निष्कासित विधायक रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व में है, जिसे ‘बागी लेकिन बहुमत’ वाला गुट बताया जा रहा है। दोनों पक्ष अब अलग-अलग पहचान के साथ आगामी विधानसभा उपचुनावों में उतरने की तैयारी कर रहे हैं।
जानकारी के मुताबिक, ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने गुरुवार की आधी रात के बाद चुनाव आयोग को पार्टी के नए नाम और चुनाव चिह्न के लिए तीन-तीन विकल्प भेजे। इसके बाद रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने शुक्रवार सुबह अपने विकल्प आयोग के समक्ष जमा किए। चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों को अपने नए नाम और चुनाव चिह्न के विकल्प जमा करने के लिए शुक्रवार सुबह 11 बजे तक की अंतिम समय सीमा दी थी।
दोनों गुटों की ओर से विकल्प जमा किए जाने के बाद अब निगाहें चुनाव आयोग के अगले फैसले पर टिकी हैं। आयोग दोनों पक्षों द्वारा दिए गए विकल्पों की जांच करेगा और निर्धारित प्रक्रिया के तहत नए पार्टी नाम तथा चुनाव चिह्न आवंटित करेगा। इन नए नामों और चुनाव चिह्नों का इस्तेमाल आगामी विधानसभा उपचुनावों में किया जाएगा।
6 अक्टूबर को नंदीग्राम और रेजीनगर में उपचुनाव
तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुटों के लिए आगामी विधानसभा उपचुनाव महत्वपूर्ण होने वाले हैं। राज्य में 6 अक्टूबर को नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं। इन दोनों सीटों के परिणाम 9 अक्टूबर को घोषित किए जाएंगे। नंदीग्राम सीट पूर्वी मेदिनीपुर जिले में है, जबकि रेजीनगर विधानसभा क्षेत्र मुर्शिदाबाद जिले में स्थित है।
इन उपचुनावों में दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न के साथ मैदान में उतरना होगा। यही वजह है कि चुनाव आयोग की ओर से नए नाम और चुनाव चिह्न के आवंटन को लेकर राजनीतिक हलकों में विशेष रुचि बनी हुई है।
हालांकि, दोनों गुटों के नेताओं ने चुनाव आयोग को अपने-अपने विकल्प सौंपे जाने की पुष्टि की है, लेकिन किसी भी पक्ष ने अपने द्वारा प्रस्तावित नामों और चुनाव चिह्नों का खुलासा नहीं किया है। दोनों पक्षों के नेताओं का कहना है कि वे पहले चुनाव आयोग की ओर से आधिकारिक घोषणा किए जाने का इंतजार करेंगे। आयोग के फैसले के बाद ही वे अपने नए नाम और चुनाव चिह्न को सार्वजनिक रूप से सामने रखेंगे।
फ्रीज किया गया ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम
इस विवाद के बीच गुरुवार रात चुनाव आयोग ने ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और घास-फूल वाले चुनाव चिह्न को फिलहाल फ्रीज करने का एलान किया था। आयोग के इस फैसले के बाद दोनों गुट फिलहाल किसी भी चुनाव में पुराने नाम और पुराने चुनाव चिह्न का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे।
‘घास-फूल’ चुनाव चिह्न तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक पहचान का लंबे समय से महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। पार्टी के गठन के बाद से ही इसी नाम और चुनाव चिह्न के साथ तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में अपनी पहचान बनाई। ऐसे में दोनों गुटों के बीच पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आयोग का फैसला आने तक दोनों पक्षों को अपनी राजनीतिक गतिविधियों और चुनावी तैयारियों के लिए नए नाम और चुनाव चिह्न का इंतजार करना होगा। आगामी उपचुनावों में मतदाताओं के सामने दोनों गुट किस नाम और निशान के साथ पहुंचेंगे, यह चुनाव आयोग के अंतिम निर्णय के बाद स्पष्ट होगा।
184 मुक्त चुनाव चिह्नों की सूची में कई विकल्प
Trinamool Congress Split : चुनाव आयोग के पास फिलहाल 184 मुक्त चुनाव चिह्नों की सूची उपलब्ध है। इस सूची में अलग-अलग तरह के कई चुनाव चिह्न शामिल हैं। इनमें एसी, अलमारी, सेब, चूड़ी, दूरबीन, कंप्यूटर, सीसीटीवी, बैटरी टॉर्च, केक, बिस्किट, शिमला मिर्च, कोट, झुमके सहित कई अन्य प्रतीक शामिल हैं।
नए नाम और चुनाव चिह्न आवंटित करने की प्रक्रिया में इन्हीं उपलब्ध मुक्त चुनाव चिह्नों में से विकल्पों पर विचार किया जाएगा। दोनों गुटों की ओर से दिए गए विकल्पों और आयोग के नियमों के आधार पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
1998 में कांग्रेस से अलग होकर बनी थी तृणमूल कांग्रेस
Trinamool Congress Split : तृणमूल कांग्रेस का राजनीतिक सफर वर्ष 1998 में शुरू हुआ था। ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी नई राजनीतिक पार्टी का गठन किया था। इसके बाद ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और घास-फूल चुनाव चिह्न पार्टी की पहचान बन गए।
पार्टी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत की और लंबे राजनीतिक संघर्ष के बाद वर्ष 2011 में राज्य की सत्ता हासिल की। इसके बाद से तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में बनी रही।
अब पार्टी के भीतर सामने आए मौजूदा विवाद के कारण उसके नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चुनाव आयोग के स्तर पर नई प्रक्रिया शुरू हुई है। दोनों गुटों द्वारा अपने-अपने विकल्प सौंपे जाने के बाद अंतिम फैसला आयोग को करना है। इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि 6 अक्टूबर को होने वाले नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा उपचुनाव में दोनों गुट किस नाम और चुनाव चिह्न के साथ चुनाव मैदान में उतरेंगे।







