निवेदिता झा, वाराणसी। Pitru Paksha
पितृपक्ष की शुरुआत के साथ ही देशभर में पितरों के प्रति श्रद्धा, तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति, तृप्ति और सद्गति की कामना को लेकर देश के प्रमुख तीर्थस्थलों का रुख करते हैं। गया, प्रयागराज और हरिद्वार जैसे तीर्थों में पिंडदान और तर्पण की विशेष धार्मिक परंपरा है, लेकिन काशी की धार्मिक मान्यताओं में पितृश्राद्ध का अपना अलग और विशेष महत्व बताया गया है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, काशी को पितरों के श्राद्ध और कर्मकांड का प्रथम द्वार माना जाता है। विशेष रूप से उन लोगों के लिए काशी का महत्व और बढ़ जाता है, जिनकी मृत्यु सामान्य रूप से न होकर दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या या किसी अन्य अस्वाभाविक परिस्थिति में हुई हो। काशी के धर्मशास्त्रियों और विद्वानों के अनुसार ऐसी परिस्थितियों में मृत्यु को अकाल मृत्यु की श्रेणी में रखा जाता है और ऐसी आत्माओं के लिए पहले काशी में विशेष कर्मकांड किए जाने की परंपरा बताई जाती है।
26 सितंबर से शुरू हो रहा पितृपक्ष
Pitru Paksha : इस वर्ष पितृपक्ष 2026 की प्रतिपदा तिथि 26 सितंबर से शुरू हो रही है, जबकि पहला श्राद्ध 27 सितंबर को किया जाएगा। इसके साथ ही देश के अलग-अलग तीर्थस्थलों पर पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म शुरू हो जाएंगे। पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालु अपने पूर्वजों को जल अर्पित करने के साथ उनकी आत्मा की शांति और सद्गति के लिए धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
श्राद्ध की चर्चा होते ही सबसे पहले गया जी का स्मरण किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि गया में विधि-विधान से पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। हालांकि काशी की धार्मिक परंपरा में कुछ विशेष परिस्थितियों के लिए गया से पहले काशी आने की बात कही गई है।
अकाल मृत्यु वाले पितरों के लिए काशी क्यों महत्वपूर्ण?
काशी के धर्मशास्त्रियों के अनुसार जिन लोगों की मृत्यु दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या या किसी अन्य असामान्य परिस्थिति में होती है, उनके लिए विशेष श्राद्ध कर्म की आवश्यकता मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं में ऐसी आत्माओं के प्रेत योनि में भटकने की आशंका व्यक्त की जाती है।
इसी मान्यता के आधार पर अकाल मृत्यु वाले व्यक्ति के लिए सीधे गया में पिंडदान करने के बजाय पहले काशी में विशेष कर्मकांड कराने की परंपरा बताई जाती है। मान्यता है कि काशी में विधि-विधान से किए गए श्राद्ध और संबंधित अनुष्ठानों के माध्यम से ऐसी आत्मा को प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है और उसे पितृ योनि प्राप्त होती है।
इसके बाद गया में पिंडदान और श्राद्ध कर्म को पितरों की तृप्ति तथा मोक्ष की दिशा में महत्वपूर्ण माना जाता है। यही वजह है कि अकाल मृत्यु से जुड़े मामलों में कई परिवार पहले वाराणसी पहुंचते हैं और यहां निर्धारित धार्मिक कर्मकांड पूरा करने के बाद गया जाकर पिंडदान करते हैं।
पिशाचमोचन कुंड का विशेष महत्व
Pitru Paksha : वाराणसी में अकाल मृत्यु से संबंधित श्राद्ध और विशेष कर्मकांड के लिए पिशाचमोचन कुंड को प्रमुख स्थानों में गिना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह स्थान उन आत्माओं की शांति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, जिनकी मृत्यु असामान्य परिस्थितियों में हुई हो।
यहां नारायण बलि, त्रिपिंडी श्राद्ध और पिंडदान जैसे विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। मान्यता है कि पिशाचमोचन कुंड में विधि-विधान के साथ स्नान, तर्पण और पिंडदान करने से अतृप्त आत्माओं को शांति मिलती है तथा प्रेत बाधा से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
पितृपक्ष के दौरान पिशाचमोचन कुंड पर विशेष रूप से ऐसे परिवारों की भीड़ देखी जाती है, जो अपने दिवंगत परिजनों के लिए धार्मिक कर्मकांड कराने काशी पहुंचते हैं। यहां पुरोहितों की देखरेख में मृत्यु की परिस्थिति और पारिवारिक परंपरा के अनुसार अलग-अलग अनुष्ठान कराए जाते हैं।
मणिकर्णिका घाट भी माना जाता है महत्वपूर्ण
Pitru Paksha : काशी में पितरों की सद्गति और मोक्ष की कामना से जुड़े कर्मकांड के लिए मणिकर्णिका घाट का भी विशेष धार्मिक महत्व बताया जाता है। मणिकर्णिका घाट को काशी का महाश्मशान कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह स्थान मोक्ष की नगरी काशी की आध्यात्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र है।
मान्यता है कि मणिकर्णिका घाट पर भगवान शिव स्वयं तारक मंत्र प्रदान करते हैं। इसी कारण काशी में मृत्यु और मोक्ष की अवधारणा का मणिकर्णिका से गहरा संबंध माना जाता है। यहां पितरों के निमित्त किया गया तर्पण और अन्य धार्मिक कर्म भी उनकी सद्गति की कामना से जुड़ा हुआ माना जाता है।
हालांकि किस व्यक्ति के लिए कौन सा कर्मकांड और किस स्थान पर किया जाना चाहिए, यह उसकी मृत्यु की परिस्थिति, पारिवारिक परंपरा और कुल पुरोहित की सलाह के आधार पर तय किया जाता है।
काशी के बाद गया में पिंडदान की परंपरा
Pitru Paksha : धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अकाल मृत्यु वाले व्यक्ति के लिए काशी में पहले प्रेत शांति से जुड़े कर्मकांड किए जाने के बाद गया में पिंडदान किया जाता है। इस क्रम को पितरों की शांति और तृप्ति से जोड़कर देखा जाता है।
काशी में होने वाले कर्मकांड का उद्देश्य जहां अकाल मृत्यु से जुड़ी आत्मा की शांति और प्रेत योनि से मुक्ति की मान्यता से जुड़ा है, वहीं गया में पिंडदान को पितरों की तृप्ति और मोक्ष की कामना से जोड़ा जाता है। इसी धार्मिक परंपरा के कारण काशी और गया दोनों ही पितृकर्म से जुड़े प्रमुख तीर्थ माने जाते हैं।
पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालु अपने पूर्वजों को स्मरण करते हुए तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करते हैं। धार्मिक आस्था रखने वाले परिवार इस अवधि को अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा प्रकट करने का विशेष अवसर मानते हैं।
Pitru Paksha : इस तरह पितृपक्ष में काशी की धार्मिक परंपरा केवल सामान्य श्राद्ध और तर्पण तक सीमित नहीं मानी जाती, बल्कि अकाल मृत्यु से जुड़े विशेष कर्मकांड, पिशाचमोचन कुंड, नारायण बलि, त्रिपिंडी श्राद्ध और मणिकर्णिका घाट जैसे धार्मिक स्थलों और अनुष्ठानों के कारण इसका अलग महत्व बताया जाता है। श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा और पुरोहितों के मार्गदर्शन के अनुसार इन स्थानों पर पितरों के लिए निर्धारित कर्मकांड करते हैं और उनकी शांति, तृप्ति तथा सद्गति की कामना करते हैं।
Author: Nivedita Jha
Nivedita Jha is a graduate from Baba Saheb Bhimrao Ambedkar University. She is also a double post graduate. She has also done journalism. She has five years of experience in journalism.






