Defence Exports : 38,424 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा रक्षा निर्यात, 80 से अधिक देशों में भारतीय उत्पादों की मांग; ‘रीआर्म यूरोप’ पहल से बढ़े अवसर
नई दिल्ली, 23 अक्टूबर। Defence Exports
भारत रक्षा विनिर्माण और निर्यात के क्षेत्र में लगातार अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। देश अब यूरोप को हथियारों का निर्यात करने वाले दुनिया के तीसरे सबसे बड़े देशों में शामिल हो गया है। यूरोपीय देशों की रक्षा जरूरतों में वृद्धि और भारत की घरेलू उत्पादन क्षमता के विस्तार से भारतीय रक्षा उद्योग को अंतरराष्ट्रीय बाजार में नए अवसर मिल रहे हैं। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने शुक्रवार को यह जानकारी दी।
रक्षा सचिव ने पत्रकारों से बातचीत में बताया कि भारत का रक्षा निर्यात बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये के अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। यह राशि लगभग 3.6 अरब यूरो के बराबर है। उन्होंने ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि पिछले एक वर्ष के दौरान भारत यूरोप को हथियार निर्यात करने वाले देशों में तीसरे स्थान पर पहुंचा है। यूरोप की ‘रीआर्म यूरोप’ पहल के तहत रक्षा सामग्री की बढ़ती मांग को इस उपलब्धि का प्रमुख कारण बताया गया है।
यूरोप में बढ़ी भारतीय रक्षा उत्पादों की मांग
Defence Exports : राजेश कुमार सिंह के अनुसार, यूरोपीय देशों द्वारा अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के प्रयासों से विभिन्न प्रकार के सैन्य उपकरणों की मांग बढ़ी है। इसका लाभ भारतीय रक्षा विनिर्माताओं को मिल रहा है।
उन्होंने बताया कि भारत से यूरोप को मानक गोला-बारूद, तोप के गोले तथा छोटे और बड़े कैलिबर के गोला-बारूद का निर्यात बढ़ा है। यूरोपीय बाजार में मांग बढ़ने से भारतीय कंपनियों के लिए उत्पादन और आपूर्ति का विस्तार करने की संभावनाएं पैदा हुई हैं।
भारत का रक्षा निर्यात केवल भारी हथियारों और गोला-बारूद तक सीमित नहीं है। देश से हेलमेट, बुलेटप्रूफ जैकेट, सैनिकों के लिए अन्य सामरिक सुरक्षा उपकरण और छोटे हथियार भी निर्यात किए जाते हैं। इस तरह भारतीय रक्षा उद्योग विभिन्न श्रेणियों के उत्पादों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है।
रक्षा सचिव ने यह भी बताया कि दक्षिण-पूर्व एशिया सहित कई क्षेत्रों में रक्षा सामग्री की आपूर्ति के लिए बातचीत चल रही है। इनमें छोटे हथियारों, तोप प्रणालियों और अन्य रक्षा उपकरणों से संबंधित प्रस्ताव शामिल हैं। विभिन्न देशों के साथ इन मामलों में बातचीत और अनुबंध की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।
16 सार्वजनिक कंपनियां, 840 निजी कंपनियां और 17 हजार छोटे उद्यम सक्रिय
Defence Exports : रक्षा सचिव ने कहा कि पिछले 10 वर्षों में भारत के रक्षा विनिर्माण तंत्र का उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। इस दौरान सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के साथ निजी उद्योगों और छोटे उद्यमों की भागीदारी भी बढ़ी है।
उन्होंने बताया कि देश में रक्षा क्षेत्र से जुड़ी 16 बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां काम कर रही हैं। इनके अतिरिक्त लगभग 840 बड़ी और मध्यम आकार की निजी कंपनियां तथा करीब 17,000 छोटे उद्यम इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। इनमें स्टार्टअप भी शामिल हैं, जो रक्षा उत्पादन और उससे संबंधित औद्योगिक गतिविधियों में योगदान दे रहे हैं।
इस विस्तृत औद्योगिक नेटवर्क ने भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता को मजबूत किया है। विभिन्न आकार की कंपनियों की भागीदारी से रक्षा उपकरणों के निर्माण और उनकी आपूर्ति के लिए व्यापक औद्योगिक आधार तैयार हुआ है।
राजेश कुमार सिंह के अनुसार, घरेलू बाजार में भी इसका प्रभाव दिखाई दे रहा है। भारत में रक्षा उत्पादों की घरेलू बिक्री अब लगभग 17 अरब यूरो तक पहुंच गई है।
रक्षा खरीद में 75 प्रतिशत घरेलू खर्च का लक्ष्य
Defence Exports : भारत सरकार रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने और घरेलू कंपनियों को अधिक अवसर देने पर जोर दे रही है। रक्षा सचिव ने बताया कि सरकार का प्रयास है कि हर साल लगभग 20 से 25 अरब डॉलर के रक्षा पूंजीगत व्यय का 75 प्रतिशत हिस्सा देश के भीतर खर्च किया जाए।
इस नीति के तहत स्वदेशी डिजाइन, विकास और विनिर्माण वाले उत्पादों को प्राथमिकता दी जा रही है। इन्हें आईडीडीएम यानी इंडिजिनसली डिजाइन, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड उत्पाद कहा जाता है।
इस पहल का उद्देश्य भारतीय कंपनियों को रक्षा उपकरणों के डिजाइन और निर्माण में सक्षम बनाना तथा महत्वपूर्ण तकनीकों के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम करना है। घरेलू खरीद में भारतीय उद्योगों की भागीदारी बढ़ने से देश में उत्पादन क्षमता और तकनीकी विशेषज्ञता के विकास को भी प्रोत्साहन मिल सकता है।
भारत वर्तमान में 80 से अधिक देशों को रक्षा सामग्री का निर्यात कर रहा है। निर्यात के इस विस्तार से भारतीय कंपनियों को घरेलू मांग के साथ-साथ विदेशी बाजारों की जरूरतों को पूरा करने का अवसर मिल रहा है।
रूस पर निर्भरता घटी, फ्रांस और इजरायल से बढ़ा रक्षा सहयोग
Defence Exports : रक्षा सचिव ने भारत के रक्षा आयात में आए बदलावों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पहले भारत रक्षा उपकरणों के लिए काफी हद तक रूस पर निर्भर था, लेकिन समय के साथ आयात के स्रोतों में विविधता आई है।
भारत के पास अब भी रूस में बने कई रक्षा उपकरण हैं, लेकिन पिछले वर्षों में फ्रांस, इजरायल और अन्य देशों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ा है। राजेश कुमार सिंह के अनुसार, रूस के बाद फ्रांस की भारत के रक्षा आयात में लगभग 15 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इजरायल की हिस्सेदारी भी करीब इतनी ही बताई गई है।
आयात के स्रोतों में विविधता लाने से भारत को अलग-अलग देशों की रक्षा तकनीकों और उपकरणों तक पहुंच बनाने में मदद मिली है। इसके साथ ही सरकार घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देकर स्वदेशी रक्षा क्षमताओं के विकास पर भी जोर दे रही है।
ग्रीस और साइप्रस के साथ रणनीतिक साझेदारी की संभावनाएं
Defence Exports : राजेश कुमार सिंह ने हाल ही में ग्रीस और साइप्रस की अपनी यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि भारत इन दोनों देशों के साथ कई रणनीतिक हितों में समानता देखता है।
उन्होंने ग्रीस और साइप्रस को भारत के लिए महत्वपूर्ण साझेदार बताते हुए कहा कि इन देशों के साथ संबंध मजबूत करने से यूरोप में भारत की पहुंच बढ़ाने के अवसर मिल सकते हैं।
रक्षा और रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार भारत को यूरोपीय देशों के साथ अपने संबंधों को और मजबूत बनाने में मदद कर सकता है। इसके माध्यम से भविष्य में रक्षा उद्योग से संबंधित साझेदारियों की संभावनाएं भी विकसित हो सकती हैं।
यूरोप में संयुक्त उद्यम स्थापित करने की योजना
Defence Exports : भारत यूरोप के रक्षा खरीद कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी बढ़ाना चाहता है। रक्षा सचिव ने बताया कि इसके लिए भारतीय रक्षा कंपनियों और यूरोपीय साझेदारों के बीच संयुक्त उद्यम स्थापित करने की संभावनाओं पर काम किया जा रहा है।
ऐसी साझेदारियों से भारतीय कंपनियों को यूरोपीय बाजार में अपनी पहुंच बढ़ाने और वहां की रक्षा आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बनने का अवसर मिल सकता है। संयुक्त उद्यमों के जरिए उत्पादन और तकनीकी सहयोग के नए रास्ते भी खुल सकते हैं।
भारत यूरोपीय रक्षा कंपनियों को भी भारतीय बाजार में निवेश करने तथा यहां संयुक्त उद्यम स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहता है। इससे विदेशी कंपनियों को भारत के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र में भागीदारी का अवसर मिलेगा और घरेलू उद्योगों के साथ सहयोग बढ़ सकता है।
रक्षा सचिव ने कहा कि यूरोपीय देश भारत के रक्षा खरीद कार्यक्रमों में भाग ले सकते हैं, लेकिन उन्हें सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ नीति से संबंधित शर्तों का पालन करना होगा। इसका उद्देश्य विदेशी भागीदारी के साथ-साथ भारत में रक्षा उत्पादन और विनिर्माण क्षमता को बढ़ावा देना है।
भारत-यूरोप रक्षा आपूर्ति श्रृंखला को एकीकृत करने पर जोर
Defence Exports : रक्षा सचिव ने उम्मीद जताई कि भारत और यूरोप के बीच प्रस्तावित साझेदारी समझौता दोनों क्षेत्रों के रक्षा विनिर्माताओं के बीच सहयोग को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
उन्होंने कहा कि भारत रक्षा उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक एकीकृत करने की दिशा में काम करना चाहता है। इससे भारतीय और यूरोपीय कंपनियों के बीच औद्योगिक सहयोग बढ़ाने तथा रक्षा सामग्री के उत्पादन और आपूर्ति में बेहतर समन्वय स्थापित करने की संभावनाएं पैदा होंगी।
भारत के लिए यह सहयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे घरेलू रक्षा कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी पहुंच बढ़ाने और यूरोपीय विनिर्माताओं के साथ काम करने का अवसर मिल सकता है। वहीं, यूरोपीय कंपनियों को भारतीय रक्षा बाजार और यहां उपलब्ध विनिर्माण क्षमता का लाभ उठाने का रास्ता मिलेगा।
भारत का रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचना और यूरोप में तीसरे सबसे बड़े हथियार निर्यातक के रूप में उसकी पहचान मजबूत होना देश के रक्षा उद्योग के विस्तार को दर्शाता है। घरेलू उत्पादन क्षमता, स्वदेशी तकनीक और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के माध्यम से भारत वैश्विक रक्षा बाजार में अपनी भूमिका बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।






