पटना, 27 अप्रैल। Bihar Prohibition Law : बिहार में लागू शराबबंदी कानून ने अपने 10 साल पूरे कर लिए हैं। एक दशक पहले लिया गया यह फैसला आज भी राज्य की राजनीति, समाज और प्रशासनिक व्यवस्था के केंद्र में बना हुआ है। इस कानून के तहत अब तक 11 लाख से अधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं और 17 लाख से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हुई है। 1 अप्रैल 2016 से लागू इस कानून के तहत राज्य में किसी भी प्रकार की शराब की बिक्री, खरीद और सेवन पर पूर्ण प्रतिबंध है।
एक फैसला जिसने बदल दी राज्य की दिशा
1 अप्रैल 2016 को बिहार सरकार ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू की थी। उस समय इस फैसले को सामाजिक सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम बताया गया था। सरकार का तर्क था कि शराबबंदी से घरेलू हिंसा में कमी आएगी, गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी और समाज में शांति का माहौल बनेगा।
लेकिन 10 साल बाद जब इस कानून का मूल्यांकन किया जा रहा है, तो तस्वीर कई पहलुओं में बंटी हुई नजर आती है। एक तरफ जहां सरकार इसे बड़ी सफलता बता रही है, वहीं दूसरी ओर कानून के क्रियान्वयन को लेकर कई सवाल भी उठते रहे हैं।
आंकड़ों की भाषा : 11 लाख मामले और 17 लाख गिरफ्तारियां
मद्यनिषेध, उत्पाद एवं निबंधन विभाग के सचिव अजय यादव ने सोमवार को जानकारी देते हुए बताया कि अप्रैल 2016 से लेकर मार्च 2026 तक शराबबंदी से जुड़े कुल 11 लाख 37 हजार 731 मामले दर्ज किए गए।
इनमें:
- विभाग द्वारा दर्ज मामले: 5 लाख 60 हजार 639
- पुलिस द्वारा दर्ज मामले: 5 लाख 77 हजार 92
इसी अवधि में कुल 17 लाख 18 हजार 58 लोगों को गिरफ्तार किया गया। ये आंकड़े बताते हैं कि कानून को लागू करने के लिए प्रशासन ने व्यापक स्तर पर कार्रवाई की है।
जमीन पर कार्रवाई : करोड़ों लीटर शराब बरामद
शराबबंदी को प्रभावी बनाने के लिए राज्यभर में लगातार छापेमारी और अभियान चलाए गए। इस दौरान भारी मात्रा में शराब बरामद की गई।
बरामदगी का विवरण इस प्रकार है:
- देशी शराब: 2 करोड़ 42 लाख 73 हजार 895 बल्क लीटर
- विदेशी शराब: 2 करोड़ 40 लाख 46 हजार 354 बल्क लीटर
यह आंकड़े इस बात का संकेत देते हैं कि प्रतिबंध के बावजूद अवैध शराब का नेटवर्क पूरी तरह खत्म नहीं हो सका।
सख्ती की एक और तस्वीर
सरकार ने केवल शराब जब्त करने तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि उसे नष्ट करने की प्रक्रिया भी तेज रखी। अजय यादव के अनुसार मार्च 2026 तक जब्त की गई कुल शराब का लगभग 98 प्रतिशत नष्ट किया जा चुका है।
यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है ताकि जब्त की गई शराब दोबारा बाजार में न पहुंचे।
वाहनों पर भी कड़ी कार्रवाई
शराब तस्करी को रोकने के लिए वाहनों पर भी सख्त कार्रवाई की गई। 10 वर्षों में कुल 1 लाख 67 हजार 447 वाहनों को जब्त किया गया।
इनमें से:
- 80 हजार 207 वाहनों की नीलामी की जा चुकी है
- 25,232 वाहनों को जुर्माना लेकर छोड़ा गया
वाहनों की इतनी बड़ी संख्या में जब्ती यह दिखाती है कि तस्करी के लिए विभिन्न माध्यमों का इस्तेमाल किया जाता रहा है।
राजस्व के मोर्चे पर नया रिकॉर्ड
जहां एक ओर शराबबंदी के कारण राज्य को उत्पाद शुल्क से होने वाले राजस्व का नुकसान हुआ, वहीं दूसरी ओर निबंधन विभाग ने राजस्व संग्रह में नया कीर्तिमान स्थापित किया है।
वित्तीय वर्ष 2025-26 में विभाग ने—
- कुल राजस्व संग्रह: 8,403 करोड़ 46 लाख रुपये
- लक्ष्य: 8,250 करोड़ रुपये
- उपलब्धि: 101.86 प्रतिशत
यह उपलब्धि बताती है कि सरकार ने राजस्व के अन्य स्रोतों को मजबूत करने पर ध्यान दिया है।
एक दिन में रिकॉर्ड: 14,905 दस्तावेजों का निबंधन
विभाग के मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने बताया कि 31 मार्च 2026 को, जो वित्तीय वर्ष का अंतिम दिन था, एक नया रिकॉर्ड बना।
उस दिन कुल दस्तावेज निबंधन: 14,905, और राजस्व प्राप्ति: 107 करोड़ 74 लाख रुपये हुए।
यह आंकड़ा प्रशासनिक क्षमता और डिजिटल प्रक्रियाओं के विस्तार की ओर इशारा करता है।
आगे का लक्ष्य: 10 हजार करोड़ का सपना
वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए सरकार ने 10 हजार करोड़ रुपये के राजस्व संग्रह का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। यह लक्ष्य दर्शाता है कि राज्य सरकार आने वाले समय में राजस्व वृद्धि को लेकर गंभीर है।
सफलता या चुनौती? दो पहलुओं वाली तस्वीर
शराबबंदी को लेकर बिहार में राय बंटी हुई है।
समर्थकों का मानना है कि
- महिलाओं की स्थिति में सुधार हुआ
- घरेलू हिंसा के मामलों में कमी आई
- परिवारों की आर्थिक स्थिति बेहतर हुई
वहीं आलोचकों का कहना है—
- अवैध शराब का कारोबार बढ़ा
- कानून का दुरुपयोग हुआ
- बड़ी संख्या में लोगों की गिरफ्तारी से सामाजिक असर पड़ा
कानून और समाज के बीच संतुलन की चुनौती
Bihar Prohibition Law : 10 साल बाद यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या केवल प्रतिबंध से सामाजिक बदलाव लाया जा सकता है, या इसके लिए जागरूकता, शिक्षा और वैकल्पिक रोजगार जैसे कदम भी उतने ही जरूरी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सामाजिक सुधार के लिए कानून के साथ-साथ समाज की भागीदारी भी जरूरी होती है।
महिलाओं की आवाज और बदलाव की उम्मीद
Bihar Prohibition Law : शराबबंदी लागू करने के पीछे सबसे बड़ा तर्क महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान था। कई गांवों और कस्बों में महिलाओं ने इस फैसले का स्वागत किया था।
आज भी कई महिलाएं मानती हैं कि शराबबंदी से उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है। हालांकि, यह भी सच है कि पूरी तरह से समस्या का समाधान अभी नहीं हो पाया है।
प्रशासन की भूमिका: लगातार निगरानी की जरूरत
इतने बड़े पैमाने पर कार्रवाई के बावजूद अवैध शराब का नेटवर्क पूरी तरह खत्म नहीं हो सका है। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रशासन को अभी और सख्ती और रणनीतिक बदलाव की जरूरत है।
तकनीक के इस्तेमाल, खुफिया तंत्र को मजबूत करने और सीमावर्ती इलाकों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत बार-बार सामने आती रही है।
आने वाला समय: क्या बदलेंगे हालात?
बिहार में शराबबंदी के 10 साल पूरे होना एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह न केवल एक कानून का मूल्यांकन करने का समय है, बल्कि यह सोचने का भी मौका है कि आगे की दिशा क्या होनी चाहिए।
- क्या सरकार इस कानून को और सख्त बनाएगी?
- क्या इसमें कुछ बदलाव किए जाएंगे?
- या फिर इसे नए तरीके से लागू किया जाएगा?
इन सवालों के जवाब आने वाले वर्षों में सामने आएंगे।
एक दशक, कई सबक
Bihar Prohibition Law : शराबबंदी का यह 10 साल का सफर कई मायनों में ऐतिहासिक रहा है। इस दौरान जहां एक ओर सामाजिक सुधार के प्रयास दिखे, वहीं दूसरी ओर कानून के क्रियान्वयन से जुड़ी चुनौतियां भी सामने आईं।
आंकड़े यह बताते हैं कि सरकार ने इस कानून को लागू करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन यह भी साफ है कि केवल सख्ती से समस्या का पूरी तरह समाधान नहीं होता।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि बिहार इस अनुभव से क्या सीखता है और किस दिशा में आगे बढ़ता है।






