नई दिल्ली, 19 जुलाई। Opposition Walkout : संसद के मानसून सत्र की शुरुआत से ठीक पहले आयोजित सर्वदलीय बैठक राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गई। बैठक का उद्देश्य आगामी सत्र को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए सभी दलों के बीच सहमति बनाना था, लेकिन शुरुआत से ही माहौल तनावपूर्ण हो गया। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने आरोप लगाया कि सरकार ने पार्टी के आधिकारिक सांसदों के बजाय कथित बागी सांसदों को बैठक में आमंत्रित कर लोकतांत्रिक परंपराओं और संसदीय नियमों की अनदेखी की है। इस मुद्दे पर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, डीएमके, वामपंथी दल, नेशनल कॉन्फ्रेंस और शिवसेना (यूबीटी) सहित कई विपक्षी दलों ने विरोध स्वरूप बैठक का बहिष्कार करते हुए वॉकआउट कर दिया।
महुआ मोइत्रा ने सरकार पर लगाए गंभीर आरोप
Opposition Walkout : बैठक से बाहर आने के बाद टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि संसदीय कार्य मंत्रालय ने ऐसे सांसदों को आमंत्रित किया, जिनकी संवैधानिक और कानूनी स्थिति अब तक स्पष्ट नहीं है। उनके अनुसार, लोकसभा सचिवालय की आधिकारिक सूची में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के 28 सांसद दर्ज हैं, लेकिन इसके बावजूद कथित बागी सांसदों को प्राथमिकता देना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
महुआ मोइत्रा ने कहा कि जिन सांसदों को बैठक में बुलाया गया है, उनके दल बदल और विलय संबंधी मामलों को अभी तक लोकसभा अध्यक्ष की मंजूरी नहीं मिली है। इतना ही नहीं, उनके खिलाफ दायर 20 अयोग्यता याचिकाएं भी लंबित हैं। ऐसे में उन्हें आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में मान्यता देना संविधान और संसदीय प्रक्रिया दोनों की भावना के विपरीत है।
‘संविधान की भावना के खिलाफ उठाया गया कदम’
टीएमसी सांसद ने संविधान के 91वें संशोधन का हवाला देते हुए कहा कि इस संशोधन के बाद अलग गुट बनाकर राजनीतिक मान्यता प्राप्त करने का कोई प्रावधान नहीं बचा है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब कानूनी प्रक्रिया पूरी ही नहीं हुई है, तब सरकार ने किस आधार पर इन सांसदों को सर्वदलीय बैठक में शामिल किया।
उनका कहना था कि यदि इस प्रकार की परंपरा को स्वीकार कर लिया गया तो भविष्य में किसी भी राजनीतिक दल की वैधानिक स्थिति को प्रभावित किया जा सकता है, जिससे संसदीय लोकतंत्र कमजोर होगा।
विपक्षी दलों ने दिखाई एकजुटता
Opposition Walkout : टीएमसी के विरोध को इस बार विपक्ष के कई बड़े दलों का खुला समर्थन मिला। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, डीएमके, वाम दल, नेशनल कॉन्फ्रेंस और शिवसेना (यूबीटी) ने इसे केवल एक दल का मामला नहीं बल्कि संसदीय व्यवस्था और संवैधानिक मर्यादाओं से जुड़ा मुद्दा बताया।
इन दलों का कहना था कि जब तक किसी सांसद या गुट की कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं हो जाती, तब तक उसे आधिकारिक मान्यता देना उचित नहीं है। इसी विरोध के चलते सभी दलों ने सामूहिक रूप से बैठक से बाहर निकलने का फैसला किया।
कांग्रेस ने बताया संविधान की रक्षा का सवाल
कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने वॉकआउट के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि उनकी पार्टी ने यह कदम केवल टीएमसी के समर्थन में नहीं, बल्कि संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा के लिए उठाया है।
उन्होंने कहा कि किसी भी मामले में अंतिम फैसला आने से पहले किसी गुट को वैधानिक मान्यता देना पूरी तरह असंवैधानिक है। उनका कहना था कि यदि लंबित मामलों की अनदेखी कर सरकार अपनी सुविधा के अनुसार प्रतिनिधियों का चयन करेगी तो इससे संसदीय संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होंगे।
प्रमोद तिवारी ने यह भी कहा कि विपक्ष लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को मजबूत करने के पक्ष में है और किसी भी तरह की राजनीतिक पक्षधरता को स्वीकार नहीं करेगा।
समाजवादी पार्टी ने भी सरकार को घेरा
Opposition Walkout : समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने भी सरकार के रवैये पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि टीएमसी नेताओं ने बैठक के दौरान यह मुद्दा उठाया कि आधिकारिक सांसदों की सूची के बजाय पहले कथित बागी सांसदों की सूची क्यों प्रस्तुत की गई।
धर्मेंद्र यादव ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताते हुए कहा कि सरकार का यह कदम विपक्षी दलों को कमजोर करने की एक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि सरकार निष्पक्ष होती तो पहले आधिकारिक रिकॉर्ड को महत्व देती, न कि विवादित दावों को।
जेएमएम ने भी जताई चिंता
झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) की सांसद महुआ माजी ने भी विपक्ष के वॉकआउट का समर्थन किया। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों को प्रलोभन देकर योजनाबद्ध तरीके से दलों को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है।
उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहां बगावत करने वाले सांसदों की कानूनी स्थिति स्पष्ट हुए बिना उन्हें राजनीतिक मान्यता देने का प्रयास किया गया। महुआ माजी ने कहा कि जब तक लोकसभा अध्यक्ष किसी गुट को आधिकारिक मान्यता नहीं देते, तब तक उसे सरकारी बैठकों में प्रतिनिधित्व देना उचित नहीं माना जा सकता।
परिसीमन का मुद्दा भी उठा
Opposition Walkout : सर्वदलीय बैठक के दौरान झारखंड मुक्ति मोर्चा ने परिसीमन के मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया। महुआ माजी ने कहा कि यदि 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन लागू किया जाता है तो झारखंड जैसे राज्यों में अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित सीटों की संख्या प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने आशंका जताई कि इससे जनजातीय समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी आ सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि केंद्र सरकार यह स्पष्ट आश्वासन देती है कि किसी भी राज्य की लोकसभा सीटें कम नहीं होंगी और सभी राजनीतिक दल इस प्रस्ताव पर सहमत होंगे, तो उनकी पार्टी अपने रुख पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार है।
मानसून सत्र से पहले बढ़ा राजनीतिक टकराव
सर्वदलीय बैठक में हुआ यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब संसद का मानसून सत्र कई महत्वपूर्ण विधेयकों और राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। आमतौर पर इस बैठक का उद्देश्य सरकार और विपक्ष के बीच संवाद स्थापित कर सदन की कार्यवाही को सुचारु बनाना होता है, लेकिन इस बार बैठक राजनीतिक टकराव और आरोप-प्रत्यारोप का मंच बन गई।
विपक्ष का कहना है कि सरकार विपक्षी दलों की वैध चिंताओं को नजरअंदाज कर रही है, जबकि सरकार की ओर से अभी तक इस विवाद पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
आने वाले सत्र पर रहेगा असर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सर्वदलीय बैठक में पैदा हुआ यह विवाद मानसून सत्र की कार्यवाही को भी प्रभावित कर सकता है। विपक्ष पहले ही कई राष्ट्रीय और राजनीतिक मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी कर चुका है। ऐसे में टीएमसी के कथित बागी सांसदों को लेकर उठा विवाद सरकार और विपक्ष के बीच टकराव को और तीखा बना सकता है।
अब सभी की नजर संसद के मानसून सत्र पर रहेगी, जहां यह मुद्दा सदन के भीतर भी जोर-शोर से उठने की संभावना है। विपक्ष इसे लोकतांत्रिक परंपराओं और संवैधानिक मर्यादाओं से जुड़ा गंभीर विषय बता रहा है, जबकि सरकार की अगली रणनीति पर भी राजनीतिक हलकों की नजर बनी हुई है।






